भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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मिश्रित प्रियता की उपलब्धि होती है वह, पत्यादि के स्वरूप से नहीं होती, अपितु वे सब अत्यानंदमय परमात्मा के अंश हैं, इसलिए होती है । जो स्वयं अत्यानंदमय होकर दूसरों को भी उस आनंद के लेश से आप्ला- वित करता है, ऐसा परमात्मा ही दृष्टव्य है, ऐसा उपदेश किया गया है । इसका तात्पर्य हुआ कि--“'अरे पति की कामना से पति प्रिय नहीं होता” इत्यादि का यह अर्थ नहीं है कि--“पति, स्त्री, धन आदि सब मेरे ही प्रयोजन के साधन हैं, मैं ही इनका प्रिय हूँ”; अपितु आत्मा की प्रीति के लिए अर्थात् परमात्मा की आराधना के लिए, ये सब अभीष्ट प्रियता प्रदान करते हैं; ऐसा मानना चाहिए । परमात्मा हि कर्मभिराराधितस्तत्तत्कर्मानुगुणं प्रतिनियतदेश- कालस्वरूपपरिमाणमाराधकानां तत्तद्वस्तुगतं प्रियत्वमापादयति “एष ह्येवानंदयति” इति श्रुतेः । नतु तत्तद्वस्तुस्वरूपेण प्रियम- प्रियंवा । यथोक्तं-- “तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय जायते ,तदेव कोपाय यतः प्रसादाय च जायते । तस्मात् दुःखात्मकं नास्ति न च किंचित्सुखात्मकम्” इति । “आत्मनस्तु कामाय” इत्यस्य जीवात्मपरत्वेऽपि “आत्मा वा अरे दृष्टव्यः” इति तु परमात्मा विषयमेव । “एष ह्येवानंदयति” इत्यादि श्रुति बतलाती है कि—परमात्मा, आराधना के अनुसार उन आराधकों को, देश-काल-स्वरूप-परिमाण- आकृतिगत प्रियता प्रदान करते हैं--जैसा कि-कहा गया--“एक ही वस्तु जो एक बार प्रीतिकारक होती है, वही पुनः दुखदायी हो जाती है, जो वस्तु क्रोधकारक होती है वही प्रीतिकारक हो जाती है, इससे ज्ञात होता है कि कोई भी वस्तु सुखात्मक या दुःखात्मक नहीं है ।” कोई भी वस्तु तत्त्वतः स्वरूप से प्रिय वा अप्रिय नहीं होती । “आत्मनस्तु कामाय” इस वाक्य के जीवात्मा परक होते हुए भी, “आत्मा वा अरे दृष्टव्यः” वाक्य तो परमात्म विषयक ही है । तत्रायमर्थः, यस्मात् पत्यादीनां इष्ट संपत्तये तत्परवशेन पत्या- दयः प्रियत्वेन नोपादीयते, अपितु आत्मेष्ट संपत्तये स्वतंत्रेण स्वीप्र-