श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०६ ) “आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति” इत्यस्य परेणानन्वये वाक्यभेदः प्रसज्येत, अभ्युपगम्यमानेऽपि वाक्यभेदे पूर्ववाक्यस्य न किंचित् प्रयोजनं दृश्यते । अतः पत्यादि सर्वप्रियं परित्यज्यात्मन एवान्वेष्टव्यत्वं यथा प्रतीयते, तथा वाक्यार्थो वर्णनीयः । ऐसी कल्पना करना अधिक युक्ति संगत होगा कि—पति आदि इसलिए प्रिय नहीं हैं कि वह पति आदि के अश हैं अपितु परमात्मा के अंश होने से उन पत्यादि की प्रियता है, ऐमा मानने से वे स्व के मान्य अंश होंगे और उपादेय होगे । “आत्मा की कामना से सब प्रिय होते हैं”, इस वाक्य का, परवर्त्ती वाक्यों के साथ यदि संबंध नहीं रहेगा तो वाक्य भेद हो जायगा, यदि वाक्य भेद को मानेंगे तो पूर्ववर्त्ती वाक्यों का कोई प्रयोजन नहीं रहेगा । इसलिए पत्यादि समस्त प्रियवस्तुओं को छोड़कर, परमात्मा के अन्वेषण की ही जिसमें प्रतीति हो, वैसा वाक्यार्थ करना अधिक समीचीन होगा । सोऽयमुच्यते—“अमृतत्त्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेन” इति वित्तादीनां नित्यनिर्दोषनिरतिशयानंदरूपामृतत्वप्राप्त्यनुपाय तामुक्तवा वित्तपुत्रपतिजायादीनां सातिशयदुःखमिश्रकाचित्कप्रिय- त्वमनुभूयमानं न पत्यादिस्वरूपप्रयुक्तम्, अपितु निरतिशयानंदस्व- भावपरमात्मप्रयुक्तम् । अतो य एव स्वयं निरतिशयानंदः सन् अन्येषामपि प्रियत्वलेशास्पदत्वमापादयति स परमात्मैव दृष्टव्यः, इत्युपदिष्ट्यते । तदयमर्थ. “न वा अरे पत्यु. कामाय पतिः प्रियो भवति” न हि पतिजायापुत्रवित्तादयो मत्प्रयोजनायाहमस्य प्रियः स्यामिति स्वसंकल्पात् प्रिया भवन्ति, अपि तु आत्मनः कामाय परमात्मन. स्वाराधक प्रियप्रतिलम्भनरूपेष्टनिर्वृत्तय इत्यर्थः । प्रसग मे कहा गया कि—“धन से अमरता की आशा नहीं है” अर्थात् ये धन आदि क्षणभंगुर पदार्थ, नित्यनिर्दोष सर्वातिशय परमानंद- मय मुक्ति लाभ के उपाय नहीं है। पति स्त्री पुत्रादि में जो कुछ दुःख ankurnagpal108@gmail.com