श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६०५ ) वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यात्मनो द्रष्टव्यत्वोपयोगितया “आत्मनस्तु कामाय” इत्युपदिष्टमिति प्रतीयते । आत्मनस्तुकामाय–आत्मनः कामसंपत्तये, काम्यन्त इति कामाः, आत्मन इष्टसंपत्तय इति यावत् । न च जीवात्मन इष्टसंपत्तये पत्यादयः प्रिया भवंति, इत्युक्ते सति तस्यजीवस्य स्वरूपमन्वेष्टव्यं भवति । प्रियमेवहि अन्वे- ष्टव्यम्, न तु प्रियंप्रति शेषिणः प्रियवियुक्तं स्वरूपम् । यस्मादात्मन इष्ट संपत्तये पत्यादयः प्रिया भवंति, तस्मात् पत्यादिप्रियं परि- त्यज्य तद्वियुक्तमात्मस्वरूपमन्वेष्टव्यमित्यसंगतं भवति । जो यह कहा कि—वाक्य के प्रारंभ में पति-पत्नी-पुत्र-धन-पशु आदि प्रिय वस्तुओं से संपर्कित होने से “द्रष्टव्य” इत्यादि में जीवात्मा को ही द्रष्टव्य आदि कहा गया है, सो यह कथन भी असंगत है । “आत्म- नस्तु कामाय” में आत्मनः पद से जीवात्मा का निर्देश मानने से “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः” इत्यादि वाक्य के साथ उसकी संगति बैठ ही नहीं सकती, क्योंकि—“आत्मा ही द्रष्टव्य है” इत्यादि में आत्मदर्शन को उप- योगी बतलाकर “आत्मा की कामना से” इत्यादि उपदेश दिया गया है, जिसका तात्पर्य होता है “आत्मा की कामपूर्ति के लिए” “काम” शब्द का तात्पर्य होता है, कामना का विषयीभूत अर्थात् अभीष्ठ विषयराशि । इस अर्थ के अनुसार आत्मनस्तु कामाय” इत्यादि का तात्पर्य होगा कि— “आत्मा की इष्ट संपत्ति के लिए ही पति पुत्रादि प्रिय होते हैं” ऐसा अर्थ होने पर जीवात्मा का स्वरूप अन्वेष्टव्य नहीं हो सकता । प्रिय वस्तु ही अन्वेषणीय होती है; प्रियवस्तु का अंगीभूत प्रियवियुक्त आत्मा का स्वरूप कभी अन्वेषणीय नहीं हो सकता । पति आदि प्रिय पदार्थों की पुंजीभूत राशि, आत्मा के प्रिय संपादन के लिए साधन हो सकती है, उन पत्यादि प्रिय वस्तुओं के अन्वेषण को छोड़कर, प्रियतारहित आत्मा के स्वरूप को अन्वेष्टव्य कहना असंगत है । प्रत्युत न पत्यादिशेषतया पत्यादीनां प्रियत्वम्, अपितु आत्मनः शेषतया पत्यादीनां प्रियत्वमित्युक्ते स्वशेषतया त एवोपादेयाः स्युः ।