श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६०४ ) यह कहना भी युक्ति युक्त नहीं है, क्योंकि—अचेतन प्रपंचमय जगत के ज्ञान के बिना समस्त ज्ञान हो नहीं सकता। उक्त प्रतिज्ञा (एक के ज्ञान से सबका ज्ञान हो जाना है) के प्रतिपादन के लिए "यही ब्राह्मण यही क्षत्रिय" इत्यादि से लेकर "यह सब कुछ आत्मास्वरूप है" यहाँ तक प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध चिदचिद् मिश्रित सारे प्रपंचमय जगत को "इदं" शब्द से बतलाकार "यह जो सब आत्म स्वरूप है" इत्यादि में उसकी आत्मा के साथ एकता दिखलाई गई है, ऐसी एकता परमात्मा में ही संभव हो सकती है। नहीदंशब्दवाच्यं चिदचिन्मिश्रं जगत् पुरुषेणाचित्संसृष्टेन तद्वियुक्तेनस्वरूपेणवावस्थितेन चैक्यमुपगच्छति। अतएव "सर्वं तं परादात् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद" इति व्यतिरिक्तत्वेन सर्व वेदन निन्दा च तथा प्रथमे च मैत्रेयीब्राह्मणे "महद्भूतमनंत- मपारम्" इति श्रुता महत्त्वाद्यो गुणाः परमात्मन एव संभवंति। अतः स एवात्र प्रतिपाद्यते। पुरुष चैतन्य हो अथवा जडमिश्रित हो, किसी भी रूप से वह इदं पद वाच्य जड़चेतनात्मक जगत के साथ अद्वैत भाव से रह नहीं सकता। इसीलिए "जो लोग आत्मा के अतिरिक्त सब पदार्थों को जानते हैं (अर्थात् सारे जगत को आत्मा से भिन्न मानते हैं) सारे पदार्थ उन्हें ही प्रतारित करते हैं" इत्यादि में जगत् को परमात्मा से भिन्न मानने की निन्दा की गई है। तथा प्रथम मैत्रेयीब्राह्मण के—"अनंत अपार स्वतः सिद्ध महान्" इत्यादि में उक्त महत्त्वादि गुण भी उस परमात्मा में ही संभव हो सकते हैं। इससे निश्चित होता है कि वह परमात्मा ही उक्त प्रकरण के प्रतिपाद्य हैं। यत्तूक्तं—पतिजायापुत्रवित्तपश्वादिप्रियान्वयिनोजीवात्मन उप- क्रमेत्वन्वेष्टव्यतया प्रतिपादनात्तद्विषयमेवेदंवाक्यमिति, तद- युक्तम्, "आत्मनस्तु कामाय" इत्यात्मशब्देन जीवात्मसंशब्दने, तस्य "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" इत्यनेनान्वयप्रसंगात्। "आत्मा