श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 675, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६१५ ) इत्यादिनाऽयं सर्वेश्वरः स्वेतरसमस्तचिदचिद्वस्तुविलक्षणस्वरूप एव सर्वशरीरः सर्वस्यात्मतयाऽवस्थित इति स्वशरीरभूतचिदचिद्- वस्तुगतैः दोषैर्न स्पृश्यत इत्यभिप्राय 'विज्ञातारमरेकेन विजानीया- दित्युक्तानुशासनाऽसि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वम्" इति समस्त वस्तुविजातीयं निखिलजगदेककारणभूतं सर्वस्य विज्ञातारं पुरुषो- त्तममुक्तप्रकारादुपासनात् ऋते केन विजानीयात् इतोदमेवोपासनम- मृतत्वोपायः, ब्रह्मप्राप्तिरेव च अमृतत्वमभिधीयते, इत्युक्तवान् । अतः परब्रह्मैवास्मिन्वाक्ये प्रतिपाद्यत इति परमेव ब्रह्म जगत्कारणं, न पुरुषस्तदधिष्ठाता च प्रकृतिरिति स्थितम् । उक्त मत के अनुसार प्रासंगिक वाक्यों का अर्थ इस प्रकार किया जावेगा कि-मैत्रेयी को, मोक्ष प्राप्ति का उपाय पूछने पर याज्ञवल्क्य ऋषि ने प्रथम तो "आत्मा ही दृष्टव्य है" इत्यादि से परमात्मोपासना को ही, मुक्ति प्राप्ति का उपाय बतलाया फिर "आत्मा में दर्शन करने से ही" इत्यादि से उपास्य वस्तु का स्वरूप तथा दुन्दुभि आदि के दृष्टान्त से उपासना की सहायक मन आदि इन्द्रियों के संयम का उपदेश सामान्यतः करके "अग्नि जैसे आर्द्र काष्ठ में है वैसे ही वह भी है" तथा "समुद्र ही जैसे सब जलों का एकमात्र आश्रय है, वैसे ही वह भी है" इत्यादि से उपास्य परब्रह्म को ही समस्त जगत का कारण बतलाते हुए समस्त प्रवृत्तियों की मूल उत्स, इन्द्रियों के नियमन का विस्तृत रूप से विवेचन करके "सैन्धव नमक का टुकड़ा जैसे बाहर भीतर एक रस है वैसे ही वह भी आनन्दैकरस स्वभाव है" इत्यादि से, मोक्ष प्राप्ति के उपायों अनुष्ठानों की वृत्ति को उत्साहित करने के लिए, जीवात्मा में अवस्थित परमात्मा को अपरिच्छिन्न ज्ञान का मूल कारण बतलाकर "विज्ञान मूर्ति (जीव) इन प्रपंचों से संसक्त होकर उत्पन्न होता है और उन्हीं के साथ विनष्ट हो जाता है" इत्यादि से अपरिच्छिन्न ज्ञानैकमूर्ति परमात्मा की ही संसारदशा में पंचभूत परिणाम रूप शरीरादि की अनुवृत्ति बतलाकर अन्त में कहा कि "मृत्यु के बाद कुछ शेष नहीं रहता" अर्थात ज्ञान ही जो कि आत्मा का एक मात्र स्वभावसिद्ध स्वरूप है, मोक्षावस्था में भी उस अपरिच्छिन्न ज्ञान ankurnagpal108@gmail.com