भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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में कोई न्यूनता नही आती , जिससे ज्ञात होता है कि -देहरूप से संबद्ध आत्मा मे अज्ञानमूलक देव- मनुष्य- दानव आदि बुद्धि होती है। "जब द्वैतबुद्धि होती है" इत्यादि मे ब्रह्मात्मभाव की प्राप्ति न होने से वस्तुओ मे विभिन्नता प्रतीत होती है जो कि अज्ञान मूलक है, जिसका अज्ञान नष्ट हो जाता है, उसे सारा जगत ब्रह्मात्मक ही प्रतीत होता है वह ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ और देखता ही नही, इसलिए उसकी भेद दृष्टि समाप्त हो जाती है, ऐसा प्रत्याख्यान करके "जिसके द्वारा यह सारा जगत ज्ञात हो जाता है उसे जानने के लिए और कौनसा उपाय शेष रह जाता है ?" इत्यादि में दिखलाया गया कि- जीवात्मा, अपने अन्तर्यामी परमात्मा की सहायता से विज्ञान संपन्न होकर सपूर्ण पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है, 'इसलिए उसे ज्ञान प्राप्त के लिए किन्ही अन्य उपायो की अपेक्षा नही होती । "स एष नेति नेति' इत्यादि से बतलाया गया कि- सर्वेश्वर निश्चित ही जड़चेतन सभी वस्तुओं से विलक्षण है, सारे पदार्थ उसके शरीर है, वही आत्मारूप से सभी मे अनुस्यूत है, फिर भी वह अपने शरीर रूप इस जड़चेतन जगत की दोष राशि से अस्पृष्ट रहता है "अरी मैत्रेयी ! उस विज्ञाता को अब अधिक और क्या जाना जा सकता है ? तुमने यह तत्वोपदेश प्राप्त कर लिया, यहाँ तक ही अमृतत्व का व्याख्यान है" अर्थात् समस्त पदार्थों से विलक्षण, समस्त जगत के एकमात्र कारण, संपूर्ण रहस्य के ज्ञाता परब्रह्म पुरुषोत्तम को, उक्त प्रकार की उपासना के अति- रिक्त और किन उपायों से जाना जा सकता है, इसलिए उपासना ही मोक्ष प्राप्ति का एकमात्र उपाय है, ब्रह्मभाव की प्राप्ति ही मोक्ष कहा गया है । इत्यादि विवेचन से सिद्ध होता है कि- परब्रह्म ही इस संपूर्ण प्रसंग के प्रतिपाद्य विषय हैं, वही एकमात्र जगत के कारण है, पुरुष अधिष्ठिता प्रकृति जगत का कारण नहीं है। ७ प्रकृत्यधिकरणः- प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ।१।४।२३।। एवं निरीश्वर सांख्ये निरस्ते सति, सेश्वरसांख्यः प्रत्यव- तिष्ठते । यद्यपि ईक्षणादि गुणयोगात् सर्वज्ञमीश्वरं जगत्कारण-