भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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त्वेन वेदान्ताः प्रतिपादयन्ति, तथापि वेदांतैरेव जगदुपादानतया प्रधानमेव प्रतिपाद्यत् इति प्रतीयते । न हि वेदान्ताः सर्वज्ञस्य अप- रिणामिनोऽधिष्ठातुरोश्वरस्यांधिष्ठेयेनाचेतनेन परिणामिना प्रधानेन विना जगतः कारणत्वमवगमयंति । तथाहि अपरिणामिनं प्रधानमेतं प्रकृतिं चैतदधिष्ठितां परिणामिनीमधीयते- "निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरंजनम्" स वा एष महानज आत्माऽ- जरोऽमरः “विकारजननीमज्ञामष्टरूपमजां ध्रुवाम्” ध्यायते अध्या- सिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः, सूयते पुरुषार्थं च तेनैवाधिष्ठिता जगत् , गौरनाद्यंतवती सा जनित्री भूतभाविनी" इति । तथा प्रकृतिमुपादानभूतामधिष्ठायैवेश्वरो विश्वं जगत्सृजतीति श्रूयते “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” मायां तु प्रकृतिंविद्यान्मायिनं तुमहेश्वरम्” इति । स्मृतिरपि “मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचरा- चरम्” इति एवम् श्रुतेऽपि प्रधानोपादानत्वे ब्रह्मणो जगत्कार- णत्व श्रुत्यन्यथानुपपत्त्यैव प्रधानस्वरूपं तस्येश्वराधिष्ठितस्य जगदुपादानत्वं च सिद्ध्यति । इस प्रकार निरीश्वर सांख्य के परास्त हो जाने पर, सेश्वरसांख्य सामने उपस्थित होता है । यद्यपि ईक्षण आदि गुणों के होने के सर्वज्ञ ईश्वर को ही, जगत के कारण रूपसे सारे वेदांत प्रतिपादन करते हैं, तथापि वे ही वेदांत, जगत की उपादान कारण प्रधान (प्रकृति) है, ऐसा प्रतिपादन करते हुए भी प्रतीत होते हैं । वेदांत वाक्य , ईश्वराधिष्ठित परिणामी अचेतन प्रकृति के अतिरिक्त , केवल अपरिणामी (निर्विकार) सर्वज्ञ ईश्वर को ही जगत कारण रूप से प्रतिपादन करते हों, ऐसा नहीं है । जैसा कि- ईश्वर को अपरिणामी तथा ईश्वराधिष्ठित प्रकृति को परिणामी बतलाने वाले निम्नवाक्यों से प्रतीत होता है “ब्रह्म अखंड, निष्क्रिय, शान्त, निर्दोष और निरंजन है "यह महान् आत्मा अजर और अमर है" समस्त विकारों की मूलकारण आठ प्रकार की अचेतन प्रकृति अजन्मा और नित्य है “वह प्रकृति, परमात्मा से अधिष्ठित होने से ज्ञेय है, परमात्मा ही उसका विस्तार करके उसे जगत् सृष्टि की प्रेरणा देते हैं, वह प्रकृति उन्ही से अधिष्ठित होकर पुरुषार्थ (भोग और अपवर्ग) और जगत का सृजन करती