श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६१८ ) है, आदि अन्तरहित, भूतभव्यात्मक गौरूपा यह प्रकृति ही सबकी जननी है।" इत्यादि। वह ईश्वर, उपादान कारणरूपा प्रकृति के अधिष्ठान पूर्वक ही संपूर्ण जगत् का निर्माण करते हैं—" मायाधीश इस प्रकृति से ही जगत् की सृष्टि करते हैं "माया को प्रकृति तथा मायाधीश को महेश्वर जानो" मेरी अध्यक्षता में प्रकृति, जडचेतन जगत् का प्रसव करती है" इत्यादि श्रुति स्मृति वाक्यों से ज्ञात होता है। उक्त उदाहरणों से एकमात्र ब्रह्म की ही जगत् कारणता सिद्ध नहीं होती, अपितु प्रधान की उपादान कारणता का स्पष्ट उल्लेख न होते हुए भी प्रकृति के बिना कार्य हो नहीं सकता इस उल्लेख से, ईश्वराधिष्ठित उस प्रकृति का अस्तित्व और उपादान कारणत्व स्वतः सिद्ध हो जाता है। एवमेवहि लोके निमित्तोपादानयोर्यत्यंतभेदो दृश्यते। मृत्सुव- र्णादेरचेतनस्य घटकटकाद्युपादानत्वं चेतनस्य कुलालसुवर्णकारादे- र्निमित्तत्वं च नियतमुपलभ्यते कार्यनिष्पत्तिश्च नियमेनानेककारक- सव्यपेक्षत्वनियमं च अतिक्रम्यैकमेव ब्रह्मोपादानं निमित्तं च प्रतिपा- दयितुं न प्रभवंति वेदांतवाक्यानि अतोब्रह्मनिमित्तकारणमेव नोपा- दानम्। उपादानं तु तदधिष्ठितंप्रधानमेव इति। ऐसे ही व्यवहार जगत् मे भी उपादान कारण और निमित्त कारण का अन्तर दृष्टिगत होता है। अचेतन मिट्टी और सुवर्ण, उपादान कारण के रूप मे तथा चेतन कुंभकार और सुवर्णकार, निमित्त कारण के रूप मे दीखते हैं। सभी कार्यों मे, अनेक कारणो की अपेक्षा नित्य दृष्टिगत होती है निमित्त और उपादान कारणों के नियमित भेद तथा कार्यों की अनेक कारण सापेक्षता का उल्लंघन करके, एकमात्र ब्रह्म को ही, उपादान और निमित्त कारण के रूप मे, वेदांत वाक्य प्रतिपादन नहीं कर सकते। इसलिए यही मानना चाहिए कि ब्रह्म निमित्त कारण मात्र है, उपादान नहीं, उपादान कारण तो ब्रह्म से अधिष्ठित प्रकृति ही है। सिद्धान्तः— एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे- प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता नुपरोधात्-इति प्रकृतिश्च उपादानं च। न निमित्त कारण मात्रं ankurnagpal108@gmail.com