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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

त्वेन वेदान्ताः प्रतिपादयन्ति, तथापि वेदांतैरेव जगदुपादानतया प्रधानमेव प्रतिपाद्यत् इति प्रतीयते । न हि वेदान्ताः सर्वज्ञस्य अप- रिणामिनोऽधिष्ठातुरोश्वरस्यांधिष्ठेयेनाचेतनेन परिणामिना प्रधानेन विना जगतः कारणत्वमवगमयंति । तथाहि अपरिणामिनं प्रधानमेतं प्रकृतिं चैतदधिष्ठितां परिणामिनीमधीयते- "निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरंजनम्" स वा एष महानज आत्माऽ- जरोऽमरः “विकारजननीमज्ञामष्टरूपमजां ध्रुवाम्” ध्यायते अध्या- सिता तेन तन्यते प्रेर्यते पुनः, सूयते पुरुषार्थं च तेनैवाधिष्ठिता जगत् , गौरनाद्यंतवती सा जनित्री भूतभाविनी" इति । तथा प्रकृतिमुपादानभूतामधिष्ठायैवेश्वरो विश्वं जगत्सृजतीति श्रूयते “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” मायां तु प्रकृतिंविद्यान्मायिनं तुमहेश्वरम्” इति । स्मृतिरपि “मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचरा- चरम्” इति एवम् श्रुतेऽपि प्रधानोपादानत्वे ब्रह्मणो जगत्कार- णत्व श्रुत्यन्यथानुपपत्त्यैव प्रधानस्वरूपं तस्येश्वराधिष्ठितस्य जगदुपादानत्वं च सिद्ध्यति । इस प्रकार निरीश्वर सांख्य के परास्त हो जाने पर, सेश्वरसांख्य सामने उपस्थित होता है । यद्यपि ईक्षण आदि गुणों के होने के सर्वज्ञ ईश्वर को ही, जगत के कारण रूपसे सारे वेदांत प्रतिपादन करते हैं, तथापि वे ही वेदांत, जगत की उपादान कारण प्रधान (प्रकृति) है, ऐसा प्रतिपादन करते हुए भी प्रतीत होते हैं । वेदांत वाक्य , ईश्वराधिष्ठित परिणामी अचेतन प्रकृति के अतिरिक्त , केवल अपरिणामी (निर्विकार) सर्वज्ञ ईश्वर को ही जगत कारण रूप से प्रतिपादन करते हों, ऐसा नहीं है । जैसा कि- ईश्वर को अपरिणामी तथा ईश्वराधिष्ठित प्रकृति को परिणामी बतलाने वाले निम्नवाक्यों से प्रतीत होता है “ब्रह्म अखंड, निष्क्रिय, शान्त, निर्दोष और निरंजन है "यह महान् आत्मा अजर और अमर है" समस्त विकारों की मूलकारण आठ प्रकार की अचेतन प्रकृति अजन्मा और नित्य है “वह प्रकृति, परमात्मा से अधिष्ठित होने से ज्ञेय है, परमात्मा ही उसका विस्तार करके उसे जगत् सृष्टि की प्रेरणा देते हैं, वह प्रकृति उन्ही से अधिष्ठित होकर पुरुषार्थ (भोग और अपवर्ग) और जगत का सृजन करती

( ६१८ ) है, आदि अन्तरहित, भूतभव्यात्मक गौरूपा यह प्रकृति ही सबकी जननी है।" इत्यादि। वह ईश्वर, उपादान कारणरूपा प्रकृति के अधिष्ठान पूर्वक ही संपूर्ण जगत् का निर्माण करते हैं—" मायाधीश इस प्रकृति से ही जगत् की सृष्टि करते हैं "माया को प्रकृति तथा मायाधीश को महेश्वर जानो" मेरी अध्यक्षता में प्रकृति, जडचेतन जगत् का प्रसव करती है" इत्यादि श्रुति स्मृति वाक्यों से ज्ञात होता है। उक्त उदाहरणों से एकमात्र ब्रह्म की ही जगत् कारणता सिद्ध नहीं होती, अपितु प्रधान की उपादान कारणता का स्पष्ट उल्लेख न होते हुए भी प्रकृति के बिना कार्य हो नहीं सकता इस उल्लेख से, ईश्वराधिष्ठित उस प्रकृति का अस्तित्व और उपादान कारणत्व स्वतः सिद्ध हो जाता है। एवमेवहि लोके निमित्तोपादानयोर्यत्यंतभेदो दृश्यते। मृत्सुव- र्णादेरचेतनस्य घटकटकाद्युपादानत्वं चेतनस्य कुलालसुवर्णकारादे- र्निमित्तत्वं च नियतमुपलभ्यते कार्यनिष्पत्तिश्च नियमेनानेककारक- सव्यपेक्षत्वनियमं च अतिक्रम्यैकमेव ब्रह्मोपादानं निमित्तं च प्रतिपा- दयितुं न प्रभवंति वेदांतवाक्यानि अतोब्रह्मनिमित्तकारणमेव नोपा- दानम्। उपादानं तु तदधिष्ठितंप्रधानमेव इति। ऐसे ही व्यवहार जगत् मे भी उपादान कारण और निमित्त कारण का अन्तर दृष्टिगत होता है। अचेतन मिट्टी और सुवर्ण, उपादान कारण के रूप मे तथा चेतन कुंभकार और सुवर्णकार, निमित्त कारण के रूप मे दीखते हैं। सभी कार्यों मे, अनेक कारणो की अपेक्षा नित्य दृष्टिगत होती है निमित्त और उपादान कारणों के नियमित भेद तथा कार्यों की अनेक कारण सापेक्षता का उल्लंघन करके, एकमात्र ब्रह्म को ही, उपादान और निमित्त कारण के रूप मे, वेदांत वाक्य प्रतिपादन नहीं कर सकते। इसलिए यही मानना चाहिए कि ब्रह्म निमित्त कारण मात्र है, उपादान नहीं, उपादान कारण तो ब्रह्म से अधिष्ठित प्रकृति ही है। सिद्धान्तः— एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे- प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्ता नुपरोधात्-इति प्रकृतिश्च उपादानं च। न निमित्त कारण मात्रं ankurnagpal108@gmail.com

ब्रह्म, उपादानकारणं ब्रह्मैवेत्यर्थः । कुतः ? प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरो- धात् । एवमेवहि प्रतिज्ञादृष्टान्तौ नोपरुध्येते । प्रतिज्ञा तावत् "स्त- ब्धोऽस्युत तमादेशमप्रोक्ष्यः येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतंमतमविज्ञातं विज्ञातम्" इत्येक विज्ञानेन सर्वविज्ञानविषया । दृष्टान्तश्च- "यथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात् "यथा सोम्यैकेन लोहमणिना" यथा सौम्यैकेन नखनिकृन्तनेन" इति कारण- विज्ञानात् कार्यविज्ञान विषयः । यदि निमित्तकारणमेव जगतो ब्रह्म, तदा तद्विज्ञानान्न समस्तंजगद्विज्ञातं स्यात् । नहि कुलालादिविज्ञानेन घटादिर्विज्ञायते । अतः प्रतिज्ञादृष्टान्त योर्बाध एव । ब्रह्मण एवोपादानत्वे उपादानभूतमृत्पिण्डलोहमणि नखनिकृं तनविज्ञानेनघटमणिकटकमुकुटायसीपरश्वथादितत्कार्यवि - ज्ञानवन्निखिलजगदुपादानभूतेब्रह्मणिविज्ञाते तत्कार्यं निखिलं जगद्विज्ञातं स्यात् । कारणमेवावस्थान्तरान्नकार्यम्, न द्रव्यान्तरमिति कार्यकारणरूपेणावस्थितमृत्तिकादिनिदर्शनेन प्रतिज्ञासमर्थनाद् ब्रह्म जगदुपादानं चेति निश्चीयते । उक्त मत का प्रत्याख्यान करते हुए सूत्रकार सिद्धान्त रूप से "प्रकृतिश्च दृष्टान्तानुपरोधात्" सूत्र प्रस्तुत करते हैं। प्रकृतिश्च अर्थात् वह उपादान भी है। वह निमित्त कारणमात्र नहीं है उपादान कारण भी है। प्रतिज्ञा और दृष्टान्त दोनों, इसविषय में एकमत हैं। प्रतिज्ञा जैसे-"हे सौम्य ! तुम स्तब्ध हो, क्या तुमने कभी किसी प्राज्ञ से उसे जानने की इच्छा की है ? जिसे जानकर अश्रुत श्रुत, अचिन्त्य चिन्त्य, अज्ञात भी ज्ञात हो जाता है" इत्यादि में एक के ज्ञान से समस्तज्ञान की प्रतिज्ञा की गई है। दृष्टांत जैसे-"हे सौम्य ! जैसे एक मिट्टी के डेले से, संपूर्ण मिट्टी के पदार्थों का ज्ञान हो जाता है" तथा "एक लोहमणि से" एक लोहनिकृन्तन (नहन्ना) से" इत्यादि में कारण के ज्ञान से कार्य का ज्ञान होता है, ऐसे दृष्टांत दिए गए। यदि ब्रह्म, जगत का निमित्त कारण मात्र है तो उसके ज्ञान से समस्त जगत का ज्ञान नहीं हो सकता। जैसे कि कुम्हार आदि की जानकारी से घर की जानकारी नहीं हो

जाती। ऐसा मानने से प्रतिज्ञा और दृष्टांत मे बाधा उपस्थित होती है। ब्रह्म को उपादान कारण मानने से ही, उसके कार्य रूप समस्त का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि- उपादान कारण रूप मिट्टी, सोना, लोहा आदि की जानकारी से, उनसे निर्मित, घडा मटकी, कगन मुकुट, कुठार आदि का ज्ञान हो जाता है। अवस्थान्तर की प्राप्ति ही तो कार्य है, वस्तु का बदल जाना कभी कार्य नही कहलाता। ऐसे कारण कार्य भाव मानने से, मिट्टी और उनके विकार घट आदि की तरह ब्रह्म और उसका कार्यरूप जगत प्रतिज्ञानुसार निश्चित होता है, इससे यह भी निश्चित है कि-ब्रह्म, उपादान कारण भी है। यत्तुनिमित्तोपादानयोर्भेदः श्रुत्यैव प्रतीयत इति, तदसत् नि- मित्तोपादानयोरैक्य प्रतीतेः "उत तमादेशमप्राक्ष्यः येनाश्रुतं श्रुतं भवति" इति। आदिश्यते प्रशिष्यतेऽनेनेत्यादेशः "एतस्य वा अक्षर- स्य प्रशासने गार्गि" इत्यादि श्रुतेः। साधकतमत्वेनकर्त्ता विवक्षितः। तमादेष्टारमप्राक्ष्यः, येनाश्रुतं श्रुतं भवति, येनादेष्ट्राऽधिष्ठात्रा श्रुते- नाश्रुतमपि श्रुतंभवतीति, निमित्तोपादानयोरैक्यं प्रतीयते। "सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेव" इति प्राक्सृष्टेरेकत्वावधारणात् अद्वितीय- पदेनाधिष्ठात्रन्तरनिवारणाच्च। जो यह कहा कि- निमित्त और उपादान का भेद तो श्रुति से ही प्रतीत होता है, यह कहना भी गलत है; "जिससे अश्रुत भी श्रुत हो जाता है" इत्यादि वाक्य ही निमित्त और उपादान की एकता बतला रहा है। जिसके द्वारा आदिष्ट अर्थात् उत्तमरूप से शासित हो, उसे आदेश कहते है, इस आदेश की बात "इस अक्षर के प्रशासन मे सूर्य और चन्द्र स्थिर है" इत्यादि वाक्य मे कही गई है। ब्रह्म ही क्रियासिद्धि के प्रधान उपाय है, इसलिए वे ही कर्त्ता रूप से विवक्षित है। इस आदेष्टा (शासक) के विषय में कहा गया कि "जिसको जान लेने से अश्रुत भी श्रुत हो जाता है" अर्थात् जो आदेष्टा (प्रकृति का अधिष्ठाता) है, उसके श्रुत हो जाने पर, अन्यान्य अश्रुत विषय भी श्रुत हो जाते हैं। इस कथन से निमित्त और उपादान की एकता प्रदान होती है "हे सौम्य !

( ६२१ ) सृष्टि के पूर्व यह जगत सत् स्वरूप ही था” इस श्रुति में, एकत्वावधा- रणता बतलाने वाली अद्वितीयता बतलाई गई है, जिससे किसी अन्य की अधिष्ठातृता का निवारित हो जाता है । ननु एवं सति—“विकारजननीम् गौरनाद्यन्तवती” इत्यादिभिः प्रकृतेराद्यन्त विरहेण नित्यत्वं जगदुपादानत्वं च श्रूयमाणं कथमुप- पद्यते ? तदुच्यते— तत्राप्यविभक्तनामरूपं कारणावस्थं ब्रह्मैव प्रकृति शब्देनाभिधीयते । ब्रह्मव्यतिरिक्तवस्त्वंतराभावात् । तथाहि श्रुतयः “सर्वं यो परादात् योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद” यत्रत्वस्य सर्वमात्मै- वाभूत तत् किं केन पश्येत् ? “इत्याद्याः । सर्वं खल्विदं ब्रह्म “ऐत- दात्म्यमिदं सर्वम्” इति कार्यावस्थं कारणावस्थं च सर्वं जगत् ब्रह्मात्मकमिति श्रवणाच्च । प्रश्न होता है कि-एकमात्र ब्रह्म को ही कारण मान लेंगे तो,“विकारों की जननी” आदि अन्त रहित गौ “इत्यादि वाक्यों में जो प्रकृति की आद्यन्तरहितनित्यता और जगत् उपदानता बतलाई गई है, उसका समा- धान कैसे होगा ? उसका उत्तर देते हैं कि- उन वाक्यों में भी अव्यक्त नामरूप वाले कारणावस्थ ब्रह्म को ही प्रकृति शब्द से बतलाया गया है । वैसी ही बात अन्य श्रुतियों में भी जैसे- “सब उसका विरोध करते हैं, जो इस जगत को ब्रह्म से भिन्न मानते हैं” जब यह सब कुछ आत्मा ही है तो किससे किसको जाना जाय ? “इत्यादि तथा”—यह सब कुछ ब्रह्म ही है “यह सब ब्रह्मात्मक ही है” इत्यादि से कार्यावस्थ और कारणावस्थ समस्त जगत को ब्रह्मात्मक बतलाया गया है । एतदुक्तं भवति—“यः पृथवीमंतरे संचरन्यस्य पृथिवी शरीरं यं पृथिवी न वेद” इत्यारभ्य “योऽव्यक्तमंतरे संचरन् यस्याव्यक्तं शरीरं यमव्यक्तं न वेद” योऽक्षरमन्तरे संचरन् यस्याक्षरं शरीरं यमक्षरं ankurnagpal108@gmail.com

( ५२२ ) न वेद” यः पृथ्व्यांतिष्ठन् पृथिव्याअन्तरो यं पृथिवी न वेद, पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमंतरोयमयति” इत्यारभ्य– ‘य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति त आत्माऽन्तर्याम्यमृत.” इति च सर्वचिदचिद्वस्तुशरीर- तया सर्वदा सर्वात्मभूतं परंब्रह्म कदाचिद्विभक्तनामरूपं, कदा- चिच्चाविभक्त नामरूपम्, यदा विभक्त नामरूपं तदा तदेव बहुत्वेन कार्यत्वेन चोच्यते, यदा चाविभक्तनामरूपं तदैकद्वितीयं कारण- मिति च । एवं सर्वदा चिदचिद् वस्तु शरोरस्य परस्य ब्रह्मणोऽ- विभक्त नामरूपा या कारणावस्था सा “गौरनाद्यंतवती” विकारजननीमज्ञाम् “अजामेकाम्” इत्यादिभिरभिधीयते इति । कथन यह है कि-“जो पृथ्वी में संचरण करता है, पृथ्वी ही जिसका शरीर है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती” इत्यादि से प्रारंभ करके “जो अव्यक्त मे संचरण करता है, अव्यक्त ही जिसका शरीर है, अव्यक्त जिसे नहीं जानता” “जो अक्षर में संचरण करता है, अक्षर ही जिसका शरीर है, जिमे अक्षर नहीं जानता” यहाँ तक तथा-“जो पृथ्वी मे स्थिति है, उस अन्तर्यामी को पृथिवी नही जानती, पृथिवी ही उसका शरीर है, वह अन्तर्यामी ही पृथ्वी का सयमन करता है” इत्यादि से प्रारंभ करके “जो आत्मा में स्थित है, उस अन्तर्यामी को आत्मा नही जानता, आत्मा ही उसका शरीर है, वह अन्तर्यामी ही आत्मा का संयमन करता है वह अन्तर्याभी ही अमृत है” यहाँ तक बतलाया गया कि-समस्त जड चेतन शरीरवाला, सर्वदा, सर्वात्मा वह परब्रह्म कभी विभक्त नामरूप वाला और कभी अविभक्त नाम रूपवाला होता है, जब वह विभक्त नाम रूप वाला होता है, तब उसे अनेक कार्यों के रूप में वर्णन किया जाता है और जब वह अविभक्त नाम रूपवाला रहता है, तो उसे “एक वही अद्वितीय कारण है” ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार सदा जड चेतन शरीर उस परब्रह्म की अविभक्त नामवाली कारणावस्था को “आदि अन्त रहित गौ” विकारजननी “एकाअजा” इत्यादि नामों से बतलाया गया है ।

( ६२३ )

ननु च - “महानव्यक्ते लीयते अव्यक्तम् अक्षरे लीयते” इति प्रलयश्रुतेरव्यक्तस्योत्पत्तिप्रलयौ प्रतीयेते, तथा च महाभारते “तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विज सत्तम” अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्नि- ष्क्रिये संप्रलीयते” इति । नैष दोषः , अचिद् वस्तुशरीरस्यब्रह्मणोऽ व्यक्तशब्दावाच्यायास्त्रिगुणावस्थायाःकार्यत्वात् । “यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिः ” इति कृत्स्न प्रलयदशायामपि ब्रह्मात्मकस्यातिसूक्ष्मस्या- चिद्वस्तुनः स्थित्यभिधाना जगत्कारणस्य परस्य ब्रह्मणः प्रकार- भूतमतिसूक्ष्मं चाचिद्वस्तु नित्यमेवेति तत्प्रकारं ब्रह्मैव “गौरना- द्यंतवती” इत्यादिष्वभिधीयते । प्रश्न यह होता है कि-“महान अव्यक्त में लीन हो जाता है, अव्यक्त अक्षर में विलीन हो जाता है' इस प्रलय को बतलाने वाली श्रुति से तो उत्पत्ति और प्रलय कार्य अव्यक्त (प्रकृति) का ही प्रतीत होता है । वैसा ही महाभारत में भी कहा गया कि-“उससे ही त्रिगुणा- त्मक अव्यक्त का जन्म हुआ, वह अव्यक्त उस पूर्ण पुरुष (परमात्मा) में ही लीन हो जाता है" इत्यादि । ठीक है इसमें कोई दोष नहीं आता; अचेतनात्मक शरीरधारी ब्रह्म की जो त्रिगुणात्मक अव्यक्त अवस्था है वही तो कार्य रूप में व्यक्त हो जाती है । “प्रलयकाल में जब तम ही था, दिन रात कुछ नहीं था” ऐसी आत्यंतिक प्रलय की अवस्था में भी ब्रह्मात्मक अति सूक्ष्म अचेतन वस्तु का अस्तित्व बतलाया गया है । इससे ज्ञात होता है कि-जगत् के कारण परब्रह्म की ही, प्रकार रूप, अति सूक्ष्म अचित् वस्तु नित्य है; उम अवस्था वाले ब्रह्म का ही “गौरनाद्यंत- वती” इत्यादि श्रुतियों में उल्लेख किया गया है । अतएव च “अक्षरं तमसिलीयते तमः परे देव एकीभवति” इति तमसि एकीभावमात्रमेव श्रूयते,नतुलयः । एकीभाव इति तमोविधानातिसूक्ष्म अचित् प्रकारस्य ब्रह्मणोऽविभक्त नामरूपतयाऽव- स्थानमभिधीयते । “तम आसीत्तमसा गूढमग्रेप्रकेतं तमसस्तन्महिमा-

( ६२४ ) जायतैकम्' इत्याद्यपि एतदेव वदति । तथा च मानवं वचः “आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः” इति । “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” । इत्यादिग्रनंत- रमेवोपपादयिष्यते, ब्रह्मणोऽपरिणामित्वश्रुतयश्च । इसी प्रकार-“अक्षर अंधकार में विलीन हो जाता है, अंधकार परम देव से एकीभूत हो जाता है" इत्यादि में, अंधकार का एकीभाव मात्र बतलाया गया है, लय नहीं। ब्रह्म की विशेष अति सूक्ष्म “तम" नामवाली जो अचित् वस्तु स्थिति है, उस अव्यक्तनामरूपवाली अवस्था को ही “एकीभाव" में दिखलाया गया है। “तम ही था” “सृष्टि के पूर्व समस्त विचित्रतायें, तम आवृत्त थीं, उसकी महिमा उस तम में ही एकीभूत थी” इत्यादि श्रुति, उक्त तथ्य की ही पुष्टि करती है। मनुस्मृति भी ऐसा ही कहती है-“यह जगत तमोभूत अलक्ष्य था, अज्ञात अतर्क्य यह सब उसी में सुप्त था” इत्यादि। मायाधीश ईश्वर ने इस (प्रकृति) के द्वारा इसकी सृष्टि की" इत्यादि वाक्यो में, बाद में भी इसी बात का प्रतिपादन किया गया है तथा ब्रह्म की अपरिणामिता की प्रति- पादिका श्रुतियाँ भी ऐसा ही निर्णय करती हैं। यत्तु एकस्य निमित्तत्वमुपादानत्वं च न संभवति, एक कार- कनिष्पाद्यस्त्वं च कार्यस्य, लोके तथा नियमदर्शनात् । अतोऽग्निना सिंचेदितिवद्वेदांतवाक्यान्येकस्मादेवोत्पत्ति प्रतिपादयितुं न प्रभवं- तीति । अत्रोच्यते—सकलेतरविलक्षणस्यपरस्यब्रह्मणः सर्वशक्तेः सर्वज्ञस्यैकस्यैव सर्वमुपपद्यते । मृदादेश्चेतनस्य ज्ञानाभावेनाधिष्ठातृ- त्वायोगादाधिष्ठातुः कुलालादेर्विचित्रपरिणामशक्तिविरहादसत्यसंक- ल्पत्या च तथा दर्शननियमः । श्रतो ब्रह्मैव जगतो निमित्तमुपा- दानं च । जो यह कहा कि—लोक दृष्ट नियमानुसार, एक ही का निमित्त और उपादान होना संभव नहीं है, तथा एक ही कारण से अनेक कार्यों

( ६२५ ) की उत्पत्ति भी संभव नहीं है। "अग्नि से सींचूंगा" इत्यादि की तरह, वेदांत वाक्य, एक ही कारण से समस्त की उत्पत्ति का, अनहोना प्रति- पादन नहीं कर सकते [अर्थात् जैसे आग से सींचना असंभव है, वैसे ही ब्रह्म का जडचेतन होना असंभव है] इसका उत्तर देते हैं—सबसे विलक्षण सर्वशक्ति संपन्न, सर्वज्ञ उस ब्रह्म से सब कुछ होना संभव है। मिट्टी आदि पदार्थों में ज्ञान के अभाव से स्वतः तो अधिष्ठातृत्व होता नहीं तथा अधिष्ठाता कुम्हार आदि मे पदार्थों को बिगाड़ कर दूसरे रूप में गढ़ने के अतिरिक्त, दूसरे तत्त्व में परिवर्त्तन करने की सत्यसंकल्पता तो होती नहीं इसलिए दृष्ट जगत् में निमित्त और उपादानता भिन्न-भिन्न है। इत्यादि विवेचन से निश्चित होता है कि—ब्रह्म, निमित्त और उपादान दोनों है। अभिध्योपदेशाच्च ।१।४।२४॥ इतश्चोभयं ब्रह्मैव "सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति" "तदै- क्षत बहुस्यां प्रजायेय" इति स्रष्टुर्ब्रह्मणः स्वस्यैव बहुभवन संकल्पो- पदेशात् । विचित्रचिदचिद्रूपेणाहमेव बहुस्यां तथा प्रजायेयेति संकल्प पूर्विका हि सृष्टिरुपदिश्यते । "उसने कामना की कि मैं बहुत होकर जन्म लूं" उसने स्वयं को अनेक रूपों में व्यक्त किया" इत्यादि में, स्रष्टा ब्रह्म की, स्वयं को ही अनेक रूपों में, प्रकट होने की संकल्पपूर्विका सृष्टि, बतलाई गई है, इससे भी ब्रह्म की निमित्त उपादान कारणता सिद्ध होती है। विचित्र जडचेतन रूप से मैं ही स्वयं, अनेक हो जाऊँगा, ऐसी संकल्पपूर्विका सृष्टि का उपदेश दिया गया है। साक्षाच्चोभयाम्नानात् ।१।४।२५॥ न केवलं प्रतिज्ञादृष्टान्ताभिध्योपदेशादिभिरयमर्थो निश्चीयते, ब्रह्मण एव निमित्तत्वमुपादानत्त्वं साक्षादाम्नायते "किंस्विद्वनं क उ स वृक्ष आसीद्यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः, मनीषिणो मनसा पृच्छतेदुतद्यदध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्। ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष ankurnagpal108@gmail.com

( १२६ ) आसीद्यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः , मनीषिणो मनसा प्रब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्" इति । अत्र हि स्रष्टुर्ब्रह्मणः किमु- पादानं कानि चोपकरणानीति लोकदृष्ट्या पृष्टे सकलेतरविलक्ष- णस्यब्रह्मणः सर्वशक्तियोगो न विरुद्ध इति ब्रह्मैवोपादानमुपकर- णानि चेति परिहृतम् । अतश्चोभयं ब्रह्म । केवल प्रतिज्ञा दृष्टांत और अभिध्या (संकल्प) आदि के (श्रौत) उपदेश से ही उक्त अर्थ निश्चित होता हो, सो बात नहीं है अपितु ब्रह्म की निमित्तोपादानकता स्पष्ट बतलाई गई है-“यह वन क्या है ? यह वृक्ष भी क्या है ? सत्य संकल्प परमात्मा ने जिसके द्वारा आकाश और पृथ्वी का निर्माण किया वह कौन सी वस्तु है ? सारा जगत स्थिरता- पूर्वक जिसमें स्थित है वह कौन सी शक्ति है ? ऐसा मनीषियों द्वारा मनन करने पर उन्हें मन से ही उत्तर मिला कि-अरे ! ब्रह्म ही बन है, ब्रह्म ही वृक्ष स्वरूप है, उन्ही से आकाश और पृथ्वि का निर्माण हुआ, सारे जगत को बना करके वह ब्रह्म ही अधिष्ठित है ।” इत्यादि में लौकिक व्यवहारानुसार, उपादान और उपकरण (साधन) की जिज्ञासा होने पर सर्वपदार्थ विलक्षण, सर्वशक्तिसंपन्न ब्रह्म को ही अविरुद्ध उपादान और उपकरण के रूप में निर्देश किया गया है, इससे सिद्ध होता है कि- दोनों प्रकार के कारण परब्रह्म परमात्मा ही है । आत्मकृतेः ।१।४।२६॥ “सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय" इति सिसृक्षुत्वेन प्रकृतस्य ब्रह्मणः तदात्मानं स्वयमकुरुत" इति सृष्टेः कर्मत्वं कर्तृत्वं च प्रतीयत इत्यात्मन एव बहुत्वकरणात्तस्यैव निमित्तत्वमुपादानत्वं च प्रतीयते । अविभक्तनामरूप आत्मा कर्त्ता, स एव विभक्त नामरूपः कार्य्यमिति, कर्तृत्वकर्मत्वयोर्नविरोधः । स्वयमेवात्मानं तथाऽकुरुतेति निमित्तमुपादानं च ।

( ६२७ ) “उसने कामना की कि अनेक होकर प्रकटूं” इस श्रुति में सृष्टि के इच्छुक ब्रह्म को “उसने स्वयं को ही बहुत किया” इत्यादि में कार्यरूप से वर्णन किया गया है, इन दोनों वाक्यों से ब्रह्म का कर्मत्व और कर्तृत्व प्रतीत होता है इस स्वयं को ही बहुत कर देने की बात से, उसका ही निमित्त और उपादान होना निश्चित होता है । वही अविभक्त नाम रूप आत्मा कर्त्ता है और वही विभक्त नामरूप कार्य है । इस प्रकार कर्तृत्व और कर्मत्व में कोई विरोध नहीं है । जो अपने को स्वयं उस रूप में परिणत करता है वही, निमित्त और उपादान है । “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” आनंदोब्रह्म अपहतपाप्माविजरोवि- मृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः “निष्कलं निष्क्रियं शांतं निरवद्यं- निरंजनम् “स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरः” इति स्वभावतो निरस्तसमस्तचेतनाचेतनवर्तिदोषगंधस्य निरतिशयज्ञानानंदैक- तानस्य परस्यब्रह्मणो विचित्रानंतापुरुषार्थास्पदचिदचिन्मिश्र प्रपंचरूपेणात्मनो बहुभवनसंकल्पपूर्वकं बहुत्वकरणं कथमुपपद्यत इत्याशंक्याह- “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनंत स्वरूप है’ आनंद ब्रह्म है “वह निष्पाप अजर अमर शोक भूख प्यास रहित है” वह निष्क्रिय, निरंजन, निर्दोष और शांत स्वभाव है “वह महान् आत्मा जरामरणरहित है” इत्यादि वक्यों से प्रतिपादित परब्रह्म जब स्वभाव से ही जडचेतनात्मक समस्त दोषों से रहित है तथा सर्वाधिक ज्ञान और आनंद का धाम है, तो उसका स्वेच्छापूर्वक अनंतविचित्रमय जडचेतन मिश्रित, जगदाकार- रूप में परिणत होना कैसे संभव है ? इस शंका का निवारण करते हैं— परिणामात् ।१।४।२७॥ परिणामस्वाभाव्यात्, नात्रोपदिश्यमानस्य परिणामस्य पर- स्मिन् ब्रह्मणि दोषावहत्वं स्वभावः प्रत्युत निरंकुशैश्वर्यावहत्वमेवे- त्यभिप्रायः । एवमेव हि परिणाम उपदिश्यते । अशेषहेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानं स्वेतरसमस्तवस्तविलक्षणं सर्वज्ञं सत्यसंकल्पं अवा-

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( ५३८ ) ध्समस्तकाममनवधिकातिशयानन्दं स्वलीलोपकरणभूतसमस्तचिद- चिद्वस्तुजातशरीरतया तदात्मभूतंपरंब्रह्मस्वशरीरभूते प्रपंचे तन्मात्राहंकारादिकारणपरम्परया तमः शब्दवाच्यातिसूक्ष्म प्रचिद्व- स्त्वेकशेषेसति, तमसि च स्वशरीरतयाऽपि पृथङ्निर्देशानर्हाति- सूक्ष्मदशापत्त्या स्वस्मिन्नेकतामापन्ने सति तथाभूततमः शरीरं ब्रह्म पूर्ववद्विभक्त नामरूपचिदचिन्मिश्रप्रपंचशरीरं स्यामिति संकल्प्याप्य- यक्रमेण जगच्छरीरतया आत्मानं परिणामयतीति सर्वेषु वेदांतेषु परिणामोपदेशः । परमात्मा परिणाम स्वभाव वाला है इसलिए उसका विचित्र जगदाकार रूप से परिणत होना असंभव नहीं है। इस प्रसंग में परब्रह्म संबंधी जिस परिणाम का वर्णन है, वह उनके स्वाभाविक परिणाम का है, इसलिए दोषी वह नहीं है, इससे

( ६२४ ) यस्यान्तरिक्षं शरीरम् यस्य वायुः शरीरम् यस्यद्यौः शरीरं यस्यादित्यः शरीरम् यस्यदिशः शरीरम् यस्य चंद्रतारकं शरी- रम् यस्याकाशः शरीरम् यस्यतमः शरीरम् यस्य तेजः शरीरम् यस्य सर्वाणिभूतानि शरीरम् यस्य प्राणः शरीरम् यस्य वाक्छ- रीरम् यस्य चक्षुः शरीरम् यस्य श्रोत्रं शरीरम् यस्यमनः शरीरम् यस्य त्वक्छरीरम् यस्य विज्ञानं शरीरम् यस्यरेतः शरीरम् इत्येवमंतेन काण्वपाठे, माध्यंदिनेतु पाठे विज्ञानस्थाने यस्या- त्माशरीरम् इति विशेषः । लोकयज्ञवेदानां परमात्मशरीरत्वम- धिकम् । तथा इसी प्रकार वृहदारण्यकोपनिषद् में संपूर्ण जगत को ब्रह्म का शरीर तथा ब्रह्म का तादात्म्य बतलाया गया है-“जो पृथिवी में स्थित होकर भी पृथिवी से भिन्न हैं, पृथिवी जिन्हें नहीं जानती, पृथिवी ही जिनका शरीर है, जो अंतर्यामी होकर पृथिवी का संयमन करते हैं, वे ही अंतर्यामी अमृत हैं" इत्यादि से प्रारंभ करके क्रमशः जल-अग्नि-अंतरिक्ष-वायु-द्यौ आदित्य-दिक्-चंद्रतारा-आकाश-तम-तेज-सर्वभूत-प्राण-वाक्-चक्षु-श्रोत-मन -त्वक्-विज्ञान-वीर्य इत्यादि सभी को उनका शरीर बतलाया गया है, उक्त काण्व शाखीय पाठ से माध्यन्दिन शाखा के पाठ में विज्ञान के स्थान पर "आत्मा" ऐसा विशेष पाठ किया गया है। तथा लोक यज्ञ और वेद को भी परमात्मा का शरीर स्थानीय कहा गया है। सुबालोपनिषदि च पृथिव्यादीनां तत्त्वानां परमात्मशरीरत्वम- भिधाय वाजसनेयकेऽनुक्तानामपि तत्त्वानां शरीरत्वं ब्रह्मण आत्म- त्वं च श्रूयते -“यस्य बुद्धिः शरीरम् यस्याहंकार शरीरम् यस्य चित्तं शरीरम् यस्याव्यक्तं शरीरम् यस्याक्षरंशरीरम् योमृत्युमं- तरे संचरन् यस्यमृत्युः शरीरम् यं मृत्युर्नवेद एष सर्वभूतान्तरात्मा- ऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको नारायणः इति । अत्र 'मृत्यु शब्देन परमसक्ष्ममचिद्वस्तु तमः शब्दवाच्यमभिधीयते "अव्यक्तमक्षरे लीयते

( ६३० ) अक्षरं तमसि लीयते" इतितस्यामेवोपनिषदि क्रमप्रत्यभिज्ञानात् । सर्वेषां आत्मनां ज्ञानावरणार्थमूलत्वेन तदेव हि तमो मृत्युशब्दव्य- पदेश्यम् । सुबालोपनिषद् में भी-ऐसे ही पृथिवी आदि तत्त्वों को परमात्मा का शरीर बतलाकर जिन्हे वाजसनेयी वृहदारण्यक मे नही बतलाया गया उन तत्त्वों को भी शरीर स्थानीय तदात्मक बतलाया गया है "बुद्धि जिनका शरीर है, अहंकार जिनका शरीर है, चित्त जिनका शरीर है, अव्यक्त जिनका शरीर है, अक्षर जिनका शरीर है, जो कि मृत्यु मे संचरण करते है मृत्यु उनका शरीर है, मृत्यु उन्हे नही जानता ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप, दिव्य देव एकमात्र नारायण ही है।" इस प्रसंग में "मृत्यु" शब्द से, अतिसूक्ष्म वस्तु "तम" का ही उल्लेख किया गया है, इसी उपनिषद् के "अव्यक्त अक्षर में विलीन होता है, अक्षर, तम में लीन होता है" इस वाक्य से उक्त तथ्य की पुष्टि होती है। यह "तम' ही, समस्त आत्माओं के ज्ञान का आवरक होकर अनर्थ करने वाला मूल कारण है, इसीलिए "मृत्यु" शब्द से उसका उल्लेख किया गया है । सुबालोपनिषद्येव ब्रह्मशरीरतया तदात्मकानां तत्त्वानां ब्रह्मरण एव प्रलय आम्नायते - "पृथिव्यप्सु प्रलीयते, आपस्तेजसि लीयन्ते, तेजो वायौ लीयते, वायुराकाशे लीयते, आकाशइन्द्रियेष्विन्द्रियाणि तन्मात्रेषु तन्मात्राणि भूतादौ लीयंते, भूतादिर्महति लीयते, महान- व्यक्ते लीयते, अव्यक्तमक्षरेलीयते, अक्षरंतमसि लीयते, तमः परेदेव एकीभवति" इति । अविभागापत्तिदशायामपि चिदचिद्वस्त्वति सूक्ष्मं सकर्मसंस्कारं तिष्ठतीत्युत्तरत्रवक्ष्यते न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वादुपपद्यते चाप्युपलभ्यते च" इति । इस सुबालोपनिषद् में ही ब्रह्म के शरीर स्थानीय तदात्मक तत्त्वों का, ब्रह्म में ही लय बतलाया गया है "पृथिवी, जलों में लीन होती है, जल तेज में लीन होते हैं, तेज, वायु में लीन होता है, वायु आकाश में लीन होता है, आकाश इन्द्रियों में लीन होता है, इन्द्रियाँ तन्मात्राओं में लीन ankurnagpal108@gmail.com

( ६३१ ) होती हैं, तन्मात्रायें भूतों में लीन होती हैं, भूत महत् में लीन होते हैं, महत् अव्यक्त में लीन होता है अव्यक्त अक्षर में लीन होता है, अक्षर तम में लीन होता है, तम परमात्मा में एकीभूत हो जाता है ।” उक्त प्रकार की अविभक्त दशा में भी समस्त जड़चेतन वस्तु, अतिसूक्ष्म रूप से, कर्मों के संस्कारों सहित उपस्थित रहते हैं, ऐसा सूत्रकार “न कर्माविभागादिति चेन्न” इत्यादि सूत्र में कहते हैं । एवं स्वस्मादविभागव्यपदेशानर्हंतया परमात्मनैकीभूतात्यंतसूक्ष्म चिदचिद्वस्तुशरीरादेकस्मादेवाद्वितीयान्निरतिशयानंदात् सर्वज्ञात् सत्यसंकल्पादब्रह्मणो नामरूपविभागाहंस्थूलचिदचिद्वस्तुशरीर- तया बहुभवनसंकल्प पूर्वको जगदाकारेण परिणामः श्रूयते। “सत्यं- ज्ञानमनंतंब्रह्मः” तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आत्माऽनंदमयः “एष ह्येवान

( ६३२ ) अत्र तपः शब्देन प्राचीनजगदाकारपर्यालोचनरूपं ज्ञानं अभि- धीयते “यस्य ज्ञानमयंतपः” इत्यादिश्रुतेः । प्राक् सृष्टं जगत् संस्था- नामालोच्येदानीमपि तत्संस्थानं जगदसृजदित्यर्थः, तथैव हि ब्रह्म सर्वेषु कल्पेष्वेकरूपमेव जगत् सृजति” सूर्याश्चंद्रमसौधाता यथा पूर्वमकल्पयत् दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो सुवः “यथा ऋतुष्वृ त्तुलिंगानि नानारूपाणि पर्यये, दृश्यंते तानितान्येव तथाभावा युगादिषु” इति श्रुतिस्मृतिभ्यः । तदयमर्थः, स्वयमपरिच्छिन्न ज्ञानानंदस्वभावोऽत्यंतसूक्ष्मतयाऽसत्कल्पस्वलीलोपकरणचिदचिद् - वस्तु शरीरतया तन्मयः परमात्मा विचित्रानंतक्रीडनकोपादित्सया स्वशरीरभत प्रकृति पुरुषसमष्टिपरम्परया महाभूतपर्यन्तमात्मा- नं तत्तच्छरीरकं परिणामय्य तन्मयः पुनः सत्यच्छब्दवाच्य विचित्र चिदचिद्मिश्र देवादिस्थावरान्तजगद्रूपोऽभवत्–इति । यहाँ तप शब्द से, पूर्व कल्पीय जगत के स्वरूप का पर्यालोचन ज्ञान ही अभिहित है “ज्ञानमयता ही जिसका तप है” इस श्रुति से यही बात सिद्ध होती है । ब्रह्म ने, सृष्टि की पूर्वतन जगदाकृति का चिन्तन कर इस समय भी, तदनुरूप सृष्टि की रचना की, यही उक्त कथन का तात्पर्य है । उसी प्रकार, यह ब्रह्म, सभी कल्पों में, एक रूप वाले जगत की सृष्टि करते हैं, ऐसा “विधाता ने पूर्व सृष्टि के अनुसार सूर्य और चंद्र की कल्पना की, द्यु लोक, पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्गलोक भी उसी प्रकार बनाया ।” “जैसे नियमित रूप से ऋतुएँ एक के बाद एक सदा प्रवृत्त होती हैं वैसे ही युगों की नियमित प्रवृत्ति होती है” इत्यादि श्रुति स्मृति प्रमाणों से ज्ञात होता है । इसका तात्पर्य यह है कि—प्रलयकाल में परमात्मा का लीलोपकरण रूप, जड़चेतन वस्तुमय शरीर अत्यंत सूक्ष्म होने से “असत्” ज्ञात होता है । अपरिच्छिन्न ज्ञान और आनंद स्वभाव स्वयं परमात्मा, पुनः उन्हीं अनंतविचित्रतापूर्ण अपने लीलोपकरणों को प्रकट करने की इच्छा से, अपने शरीर स्थानीय प्रकृति पुरुष आदि को, समुदाय क्रम से महाभूत पर्यन्त, विशेष विशेष शरीरों के आकार में ankurnagpal108@gmail.com

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परिणत करके, स्वयं भी तन्मय होकर प्रत्यक्ष और परोक्षात्मक जडचेतन युक्त विचित्र, देवता से स्तम्ब पर्यन्त जगदाकार रूपों में परिणत हो गए ।

“तदेवानुप्राविशत्तदनुप्रविश्य” इति कारणावस्थायामात्मतयाऽ- वस्थितः परमात्मैव कार्यरूपेण विक्रियमाणद्रव्यस्याप्यात्मतयाऽ वस्थाय तत्तदभवदित्यच्यते । एवं परमात्मचिदचिद् संघात रूपजगदाकार परिणामे परमात्मशरीरभूतचिदंशगताः सर्वं एवापुरुषार्थाः तथाभूताचिदंशगताश्च सर्वे विकाराः परमात्मनि कार्यत्वम् तदवस्थयोस्तयोः नियतृत्वेनात्मत्वम्, परमात्मा तु तयोः स्वशरीरभूतयोर्नियंतृतयाऽत्मभूतस्तद्गता पुरुषार्थैर्विकारैश्च न स्पृश्यते, अपरिच्छिन्नज्ञानानंदमयः सर्वदैकरूप एव जगत् परि- वर्त्तनलीलयाऽवतिष्ठते । तदेतदाह-“सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्” इति । विचित्र चिदचिद्रूपेण विक्रियमाणमपि ब्रह्म सत्यमेवाभवत् निरस्तनिखिलदोषगंधमपरिच्छिन्नज्ञानानंदमेकरूपमेवाभवदित्यर्थः ।

“उन्होंने उन सब में प्रवेश करके” इत्यादि में कहा गया कि- जगत की कारणावस्था के रूप में स्थित परमात्मा ही कार्य रूप से परिणत वस्तु में आत्मा रूप से स्थित होकर उन्हीं रूपों के हो गए । परमात्मा का जडचेतन समष्टि रूप जो परिणाम है, वह परमात्मा के शरीर स्थानीय, चेतन अंशरूप (जीवों) के लिए पुरुषार्थ नहीं है (अपितु निवार्य है) तथा परमात्मा के ही शरीर भूत समस्त अचेतन विकार ये दोनों (चेतनांश जीव और अचेतनांश जगत) ही परमात्मा के कार्य हैं, इन दोनों में अतर्यामी रूप से स्थित होकर नियंत्रण करने वाले परमात्मा के ये आत्मीय भी है। परमात्मा इन दोनों शरीरों के नियंता और अन्तर्यामी होते हुए भी, उनके अपुरुषार्थ और विकारों को स्पर्श नहीं करते, वह तो अनिवार्य ज्ञानानंदमय, सदा एक रूप से स्थित रहते हुए, जगत की परिवर्त्तन रूप लीला का संपादन करते रहते है । इसी लिए

( ६३४ ) कहा गया कि—'वह सत्यस्वरूप परमात्मा, सत्य और असत्य रूप हो गए।' इत्यादि विचित्र जडचेतन रूप से विकृत होते हुए भी, ब्रह्म स्वयं सत्य ही है, अर्थात् समस्त दोषों से अनस्पृष्ट, अनिवार्य ज्ञानानंदमय वह सदा एक रूप रहते हैं। सर्वाणि चिदचिद्वस्तूनि, सूक्ष्मदशापन्नानि स्थूलदशा- पन्नानि च परस्य ब्रह्मणो लीलोपकरणानि सृष्ट्यादयश्चलीलेति, भगवद् द्वैपायन पराशरादिभिरुक्तम् “अव्यक्तादिविशेषांतं परिणा- मर्धिसंयुतम् क्रीडाहरेरिदं सर्वं क्षरमित्युपधार्यताम्” क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय बालः क्रीडनकैरेव इत्या- दिभिः। वक्ष्यति च—“लोकवत्तु लीला कैवल्यम्” इति । सारी जडचेतन वस्तुएं, चाहे वह सूक्ष्मदशा में हों अथवा स्थूल दशा में हों, परब्रह्म की लीलोपकरण मात्र है, यह सब सृष्टि आदि परमात्मा की लीला ही है, ऐसा भगवान् द्वैपायन और पराशर आदि का कथन है। “परिणाम युक्त, अव्यक्त से लेकर विशेष (स्थूल विकार) तक सब कुछ, हरि की क्रीडा मात्र है, इसे क्षर ही मानना चाहिए, हरि की इस क्रीडा को, बालकों की क्रीडात्मक चेष्टा ही समझना चाहिए” बालक जैसे खिलोना आदि से खेलता है वैसे ही-इत्यादि। लोकवत्तु लीला कैवल्यम्' इस सूत्र में भगवान बादरायण उक्त बात ही कहते हैं। “अस्मान्मायी सृजेत विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया सन्नि- रुद्धः” इति ब्रह्मणि जगद्रूपतया विक्रियमाणेऽपि तत्प्रकारभूता- चिदंशगताः सर्वे विकाराः तत्प्रकारभूत क्षेत्रगताश्चापुरुषार्था इति विवेक्तुं प्रकृतिपुरुषयोर्ब्रह्मशरीरभूतयोस्तदानीं तथा निर्देशानर्हति सूक्ष्मदशापत्त्या ब्रह्मणैकीभूतयोरपि भेदेनव्यपदेशः “तदात्मानं स्वयमकुरुत” इत्यादिभिरैकार्थ्यात् । तथा च मानवं वचः—“सोऽ- भिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः अप एव ससर्जादौ तासुवीर्यमपासृजत्” इति । अतएव ब्रह्मणो निर्दोषत्वनिर्विकारत्व- श्रुतयश्चोपपन्नाः अतो ब्रह्मैव जगतो निमित्तमुपादानं च । ankurnagpal108@gmail.com

( ६३५ ) "मायाधीश इस प्रकृति से, इस विश्व की सृष्टि करते हैं, और दूसरा (जीव) माया द्वारा इस सृष्टि में बाना जाता है" इत्यादि में यह बतलाया गया है कि-ब्रह्म के जगदाकार रूप में विकृत होने पर उनका जितना भी विकार है वह तो सारा का सारा उनके शरीर स्थानीय अचेतनांश मे प्रतिष्ठित रहता है, तथा जो कुछ अपुरुषार्थ (परिहार्य अनर्थ) है वह परमात्मा के ही शरीर स्थानीय क्षेत्रज्ञ (जीव) में रहता है । इस बात को स्पष्ट करने के लिए ही, ब्रह्म की शरीर भूत अवर्णनीय अतिसूक्ष्म अवस्था वाली वस्तु प्रकृति और पुरुष को ब्रह्मात्मक होते हुए, भी, भिन्न बतलाया गया है । ऐसा मानने से ही “उन्होंने स्वयं अपने को जगद् रूप में परिणत किया" इत्यादि वाक्यों का सामंजस्य हो सकता है । ऐसा ही मनुजी का भी वचन है-“उन्होंने अपने शरीर से विविध प्रजा की सृष्टि की इच्छा से सर्व प्रथम जल की सृष्टि की और उसमें वीर्य का रोपण किया ।” इस प्रकार ब्रह्म की निर्दोषता और निर्विकारता श्रुतियों से सिद्ध होती है । ब्रह्म ही जगत के निमित्त और उपादान कारण हैं । योनिश्च हि गीयते ।१।४।२८। इतश्च जगतोनिमित्तमुपादानं च ब्रह्म, यस्माद् योनित्वेनाप्य- भिधीयते “कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्म योनिम्” इति । “यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः” इति च योनिशब्दश्चोपादानवचन इति । “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च” इति वाक्यशेषादवगम्यते । इसलिए भी, ब्रह्म, जगत के निमित्त और उपादान कारण हैं कि परमात्मा को सब की योनि बतलाया गया है । "जगत कर्त्ता पुरुष, योनि स्वरूप ब्रह्म को” “उस भूत योनि को साधक लोग दर्शन करते हैं' इत्यादि में उन्हें योनि शब्द से निर्देश किया गया है "जैसे कि मकड़ी सृजन और ग्रहण करती है" इत्यादि वाक्यशेष से, उसकी उपादानता भी ज्ञात होती है । ८ सर्वव्याख्यानाधिकरणः- एतेन सर्वे व्याख्याताः व्याख्याताः ।१।४।२९॥ ankurnagpal108@gmail.com

( ६३६ ) एतेन पादचतुष्टयोक्तन्यायकलापेन, सर्ववेदांतेषु जगत् कारण प्रतिपादनपराः सर्वे वाक्य विशेषाः चेतनविलक्षण सर्वज्ञ सर्वशक्ति ब्रह्म प्रतिपादनपरा व्याख्याताः । “व्याख्याताः” इति पदाभ्यासो अध्याय परिसमाप्ति द्योतनार्थः । इस अध्याय के चारों पादो का जिस प्रणाली से विवेचन किया गया है, उससे निश्चित होता है कि—समस्त वेदांतशास्त्र के जगत प्रति- पादक विशेष वाक्यों में, जडचेतन से विलक्षण सर्वज्ञ सर्वशक्ति संपन्न ब्रह्म का प्रतिपादन ही, एकमात्र तात्पर्य है । “व्याख्याताः” पद की द्विरुक्ति अध्याय समाप्ति की सूचिका है । प्रथम अध्याय समाप्त