भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ६३२ ) अत्र तपः शब्देन प्राचीनजगदाकारपर्यालोचनरूपं ज्ञानं अभि- धीयते “यस्य ज्ञानमयंतपः” इत्यादिश्रुतेः । प्राक् सृष्टं जगत् संस्था- नामालोच्येदानीमपि तत्संस्थानं जगदसृजदित्यर्थः, तथैव हि ब्रह्म सर्वेषु कल्पेष्वेकरूपमेव जगत् सृजति” सूर्याश्चंद्रमसौधाता यथा पूर्वमकल्पयत् दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो सुवः “यथा ऋतुष्वृ त्तुलिंगानि नानारूपाणि पर्यये, दृश्यंते तानितान्येव तथाभावा युगादिषु” इति श्रुतिस्मृतिभ्यः । तदयमर्थः, स्वयमपरिच्छिन्न ज्ञानानंदस्वभावोऽत्यंतसूक्ष्मतयाऽसत्कल्पस्वलीलोपकरणचिदचिद् - वस्तु शरीरतया तन्मयः परमात्मा विचित्रानंतक्रीडनकोपादित्सया स्वशरीरभत प्रकृति पुरुषसमष्टिपरम्परया महाभूतपर्यन्तमात्मा- नं तत्तच्छरीरकं परिणामय्य तन्मयः पुनः सत्यच्छब्दवाच्य विचित्र चिदचिद्मिश्र देवादिस्थावरान्तजगद्रूपोऽभवत्–इति । यहाँ तप शब्द से, पूर्व कल्पीय जगत के स्वरूप का पर्यालोचन ज्ञान ही अभिहित है “ज्ञानमयता ही जिसका तप है” इस श्रुति से यही बात सिद्ध होती है । ब्रह्म ने, सृष्टि की पूर्वतन जगदाकृति का चिन्तन कर इस समय भी, तदनुरूप सृष्टि की रचना की, यही उक्त कथन का तात्पर्य है । उसी प्रकार, यह ब्रह्म, सभी कल्पों में, एक रूप वाले जगत की सृष्टि करते हैं, ऐसा “विधाता ने पूर्व सृष्टि के अनुसार सूर्य और चंद्र की कल्पना की, द्यु लोक, पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्गलोक भी उसी प्रकार बनाया ।” “जैसे नियमित रूप से ऋतुएँ एक के बाद एक सदा प्रवृत्त होती हैं वैसे ही युगों की नियमित प्रवृत्ति होती है” इत्यादि श्रुति स्मृति प्रमाणों से ज्ञात होता है । इसका तात्पर्य यह है कि—प्रलयकाल में परमात्मा का लीलोपकरण रूप, जड़चेतन वस्तुमय शरीर अत्यंत सूक्ष्म होने से “असत्” ज्ञात होता है । अपरिच्छिन्न ज्ञान और आनंद स्वभाव स्वयं परमात्मा, पुनः उन्हीं अनंतविचित्रतापूर्ण अपने लीलोपकरणों को प्रकट करने की इच्छा से, अपने शरीर स्थानीय प्रकृति पुरुष आदि को, समुदाय क्रम से महाभूत पर्यन्त, विशेष विशेष शरीरों के आकार में ankurnagpal108@gmail.com