श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६३१ ) होती हैं, तन्मात्रायें भूतों में लीन होती हैं, भूत महत् में लीन होते हैं, महत् अव्यक्त में लीन होता है अव्यक्त अक्षर में लीन होता है, अक्षर तम में लीन होता है, तम परमात्मा में एकीभूत हो जाता है ।” उक्त प्रकार की अविभक्त दशा में भी समस्त जड़चेतन वस्तु, अतिसूक्ष्म रूप से, कर्मों के संस्कारों सहित उपस्थित रहते हैं, ऐसा सूत्रकार “न कर्माविभागादिति चेन्न” इत्यादि सूत्र में कहते हैं । एवं स्वस्मादविभागव्यपदेशानर्हंतया परमात्मनैकीभूतात्यंतसूक्ष्म चिदचिद्वस्तुशरीरादेकस्मादेवाद्वितीयान्निरतिशयानंदात् सर्वज्ञात् सत्यसंकल्पादब्रह्मणो नामरूपविभागाहंस्थूलचिदचिद्वस्तुशरीर- तया बहुभवनसंकल्प पूर्वको जगदाकारेण परिणामः श्रूयते। “सत्यं- ज्ञानमनंतंब्रह्मः” तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्योऽन्तर आत्माऽनंदमयः “एष ह्येवान