श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६३० ) अक्षरं तमसि लीयते" इतितस्यामेवोपनिषदि क्रमप्रत्यभिज्ञानात् । सर्वेषां आत्मनां ज्ञानावरणार्थमूलत्वेन तदेव हि तमो मृत्युशब्दव्य- पदेश्यम् । सुबालोपनिषद् में भी-ऐसे ही पृथिवी आदि तत्त्वों को परमात्मा का शरीर बतलाकर जिन्हे वाजसनेयी वृहदारण्यक मे नही बतलाया गया उन तत्त्वों को भी शरीर स्थानीय तदात्मक बतलाया गया है "बुद्धि जिनका शरीर है, अहंकार जिनका शरीर है, चित्त जिनका शरीर है, अव्यक्त जिनका शरीर है, अक्षर जिनका शरीर है, जो कि मृत्यु मे संचरण करते है मृत्यु उनका शरीर है, मृत्यु उन्हे नही जानता ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप, दिव्य देव एकमात्र नारायण ही है।" इस प्रसंग में "मृत्यु" शब्द से, अतिसूक्ष्म वस्तु "तम" का ही उल्लेख किया गया है, इसी उपनिषद् के "अव्यक्त अक्षर में विलीन होता है, अक्षर, तम में लीन होता है" इस वाक्य से उक्त तथ्य की पुष्टि होती है। यह "तम' ही, समस्त आत्माओं के ज्ञान का आवरक होकर अनर्थ करने वाला मूल कारण है, इसीलिए "मृत्यु" शब्द से उसका उल्लेख किया गया है । सुबालोपनिषद्येव ब्रह्मशरीरतया तदात्मकानां तत्त्वानां ब्रह्मरण एव प्रलय आम्नायते - "पृथिव्यप्सु प्रलीयते, आपस्तेजसि लीयन्ते, तेजो वायौ लीयते, वायुराकाशे लीयते, आकाशइन्द्रियेष्विन्द्रियाणि तन्मात्रेषु तन्मात्राणि भूतादौ लीयंते, भूतादिर्महति लीयते, महान- व्यक्ते लीयते, अव्यक्तमक्षरेलीयते, अक्षरंतमसि लीयते, तमः परेदेव एकीभवति" इति । अविभागापत्तिदशायामपि चिदचिद्वस्त्वति सूक्ष्मं सकर्मसंस्कारं तिष्ठतीत्युत्तरत्रवक्ष्यते न कर्माविभागादिति चेन्नानादित्वादुपपद्यते चाप्युपलभ्यते च" इति । इस सुबालोपनिषद् में ही ब्रह्म के शरीर स्थानीय तदात्मक तत्त्वों का, ब्रह्म में ही लय बतलाया गया है "पृथिवी, जलों में लीन होती है, जल तेज में लीन होते हैं, तेज, वायु में लीन होता है, वायु आकाश में लीन होता है, आकाश इन्द्रियों में लीन होता है, इन्द्रियाँ तन्मात्राओं में लीन ankurnagpal108@gmail.com