श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 682, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५२२ ) न वेद” यः पृथ्व्यांतिष्ठन् पृथिव्याअन्तरो यं पृथिवी न वेद, पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमंतरोयमयति” इत्यारभ्य– ‘य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति त आत्माऽन्तर्याम्यमृत.” इति च सर्वचिदचिद्वस्तुशरीर- तया सर्वदा सर्वात्मभूतं परंब्रह्म कदाचिद्विभक्तनामरूपं, कदा- चिच्चाविभक्त नामरूपम्, यदा विभक्त नामरूपं तदा तदेव बहुत्वेन कार्यत्वेन चोच्यते, यदा चाविभक्तनामरूपं तदैकद्वितीयं कारण- मिति च । एवं सर्वदा चिदचिद् वस्तु शरोरस्य परस्य ब्रह्मणोऽ- विभक्त नामरूपा या कारणावस्था सा “गौरनाद्यंतवती” विकारजननीमज्ञाम् “अजामेकाम्” इत्यादिभिरभिधीयते इति । कथन यह है कि-“जो पृथ्वी में संचरण करता है, पृथ्वी ही जिसका शरीर है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती” इत्यादि से प्रारंभ करके “जो अव्यक्त मे संचरण करता है, अव्यक्त ही जिसका शरीर है, अव्यक्त जिसे नहीं जानता” “जो अक्षर में संचरण करता है, अक्षर ही जिसका शरीर है, जिमे अक्षर नहीं जानता” यहाँ तक तथा-“जो पृथ्वी मे स्थिति है, उस अन्तर्यामी को पृथिवी नही जानती, पृथिवी ही उसका शरीर है, वह अन्तर्यामी ही पृथ्वी का सयमन करता है” इत्यादि से प्रारंभ करके “जो आत्मा में स्थित है, उस अन्तर्यामी को आत्मा नही जानता, आत्मा ही उसका शरीर है, वह अन्तर्यामी ही आत्मा का संयमन करता है वह अन्तर्याभी ही अमृत है” यहाँ तक बतलाया गया कि-समस्त जड चेतन शरीरवाला, सर्वदा, सर्वात्मा वह परब्रह्म कभी विभक्त नामरूप वाला और कभी अविभक्त नाम रूपवाला होता है, जब वह विभक्त नाम रूप वाला होता है, तब उसे अनेक कार्यों के रूप में वर्णन किया जाता है और जब वह अविभक्त नाम रूपवाला रहता है, तो उसे “एक वही अद्वितीय कारण है” ऐसा कहा जाता है। इसी प्रकार सदा जड चेतन शरीर उस परब्रह्म की अविभक्त नामवाली कारणावस्था को “आदि अन्त रहित गौ” विकारजननी “एकाअजा” इत्यादि नामों से बतलाया गया है ।