श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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ननु च - “महानव्यक्ते लीयते अव्यक्तम् अक्षरे लीयते” इति प्रलयश्रुतेरव्यक्तस्योत्पत्तिप्रलयौ प्रतीयेते, तथा च महाभारते “तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विज सत्तम” अव्यक्तं पुरुषे ब्रह्मन्नि- ष्क्रिये संप्रलीयते” इति । नैष दोषः , अचिद् वस्तुशरीरस्यब्रह्मणोऽ व्यक्तशब्दावाच्यायास्त्रिगुणावस्थायाःकार्यत्वात् । “यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिः ” इति कृत्स्न प्रलयदशायामपि ब्रह्मात्मकस्यातिसूक्ष्मस्या- चिद्वस्तुनः स्थित्यभिधाना जगत्कारणस्य परस्य ब्रह्मणः प्रकार- भूतमतिसूक्ष्मं चाचिद्वस्तु नित्यमेवेति तत्प्रकारं ब्रह्मैव “गौरना- द्यंतवती” इत्यादिष्वभिधीयते । प्रश्न यह होता है कि-“महान अव्यक्त में लीन हो जाता है, अव्यक्त अक्षर में विलीन हो जाता है' इस प्रलय को बतलाने वाली श्रुति से तो उत्पत्ति और प्रलय कार्य अव्यक्त (प्रकृति) का ही प्रतीत होता है । वैसा ही महाभारत में भी कहा गया कि-“उससे ही त्रिगुणा- त्मक अव्यक्त का जन्म हुआ, वह अव्यक्त उस पूर्ण पुरुष (परमात्मा) में ही लीन हो जाता है" इत्यादि । ठीक है इसमें कोई दोष नहीं आता; अचेतनात्मक शरीरधारी ब्रह्म की जो त्रिगुणात्मक अव्यक्त अवस्था है वही तो कार्य रूप में व्यक्त हो जाती है । “प्रलयकाल में जब तम ही था, दिन रात कुछ नहीं था” ऐसी आत्यंतिक प्रलय की अवस्था में भी ब्रह्मात्मक अति सूक्ष्म अचेतन वस्तु का अस्तित्व बतलाया गया है । इससे ज्ञात होता है कि-जगत् के कारण परब्रह्म की ही, प्रकार रूप, अति सूक्ष्म अचित् वस्तु नित्य है; उम अवस्था वाले ब्रह्म का ही “गौरनाद्यंत- वती” इत्यादि श्रुतियों में उल्लेख किया गया है । अतएव च “अक्षरं तमसिलीयते तमः परे देव एकीभवति” इति तमसि एकीभावमात्रमेव श्रूयते,नतुलयः । एकीभाव इति तमोविधानातिसूक्ष्म अचित् प्रकारस्य ब्रह्मणोऽविभक्त नामरूपतयाऽव- स्थानमभिधीयते । “तम आसीत्तमसा गूढमग्रेप्रकेतं तमसस्तन्महिमा-