श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२४ ) जायतैकम्' इत्याद्यपि एतदेव वदति । तथा च मानवं वचः “आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः” इति । “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्” । इत्यादिग्रनंत- रमेवोपपादयिष्यते, ब्रह्मणोऽपरिणामित्वश्रुतयश्च । इसी प्रकार-“अक्षर अंधकार में विलीन हो जाता है, अंधकार परम देव से एकीभूत हो जाता है" इत्यादि में, अंधकार का एकीभाव मात्र बतलाया गया है, लय नहीं। ब्रह्म की विशेष अति सूक्ष्म “तम" नामवाली जो अचित् वस्तु स्थिति है, उस अव्यक्तनामरूपवाली अवस्था को ही “एकीभाव" में दिखलाया गया है। “तम ही था” “सृष्टि के पूर्व समस्त विचित्रतायें, तम आवृत्त थीं, उसकी महिमा उस तम में ही एकीभूत थी” इत्यादि श्रुति, उक्त तथ्य की ही पुष्टि करती है। मनुस्मृति भी ऐसा ही कहती है-“यह जगत तमोभूत अलक्ष्य था, अज्ञात अतर्क्य यह सब उसी में सुप्त था” इत्यादि। मायाधीश ईश्वर ने इस (प्रकृति) के द्वारा इसकी सृष्टि की" इत्यादि वाक्यो में, बाद में भी इसी बात का प्रतिपादन किया गया है तथा ब्रह्म की अपरिणामिता की प्रति- पादिका श्रुतियाँ भी ऐसा ही निर्णय करती हैं। यत्तु एकस्य निमित्तत्वमुपादानत्वं च न संभवति, एक कार- कनिष्पाद्यस्त्वं च कार्यस्य, लोके तथा नियमदर्शनात् । अतोऽग्निना सिंचेदितिवद्वेदांतवाक्यान्येकस्मादेवोत्पत्ति प्रतिपादयितुं न प्रभवं- तीति । अत्रोच्यते—सकलेतरविलक्षणस्यपरस्यब्रह्मणः सर्वशक्तेः सर्वज्ञस्यैकस्यैव सर्वमुपपद्यते । मृदादेश्चेतनस्य ज्ञानाभावेनाधिष्ठातृ- त्वायोगादाधिष्ठातुः कुलालादेर्विचित्रपरिणामशक्तिविरहादसत्यसंक- ल्पत्या च तथा दर्शननियमः । श्रतो ब्रह्मैव जगतो निमित्तमुपा- दानं च । जो यह कहा कि—लोक दृष्ट नियमानुसार, एक ही का निमित्त और उपादान होना संभव नहीं है, तथा एक ही कारण से अनेक कार्यों