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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १२६ ) आसीद्यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः , मनीषिणो मनसा प्रब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन्" इति । अत्र हि स्रष्टुर्ब्रह्मणः किमु- पादानं कानि चोपकरणानीति लोकदृष्ट्या पृष्टे सकलेतरविलक्ष- णस्यब्रह्मणः सर्वशक्तियोगो न विरुद्ध इति ब्रह्मैवोपादानमुपकर- णानि चेति परिहृतम् । अतश्चोभयं ब्रह्म । केवल प्रतिज्ञा दृष्टांत और अभिध्या (संकल्प) आदि के (श्रौत) उपदेश से ही उक्त अर्थ निश्चित होता हो, सो बात नहीं है अपितु ब्रह्म की निमित्तोपादानकता स्पष्ट बतलाई गई है-“यह वन क्या है ? यह वृक्ष भी क्या है ? सत्य संकल्प परमात्मा ने जिसके द्वारा आकाश और पृथ्वी का निर्माण किया वह कौन सी वस्तु है ? सारा जगत स्थिरता- पूर्वक जिसमें स्थित है वह कौन सी शक्ति है ? ऐसा मनीषियों द्वारा मनन करने पर उन्हें मन से ही उत्तर मिला कि-अरे ! ब्रह्म ही बन है, ब्रह्म ही वृक्ष स्वरूप है, उन्ही से आकाश और पृथ्वि का निर्माण हुआ, सारे जगत को बना करके वह ब्रह्म ही अधिष्ठित है ।” इत्यादि में लौकिक व्यवहारानुसार, उपादान और उपकरण (साधन) की जिज्ञासा होने पर सर्वपदार्थ विलक्षण, सर्वशक्तिसंपन्न ब्रह्म को ही अविरुद्ध उपादान और उपकरण के रूप में निर्देश किया गया है, इससे सिद्ध होता है कि- दोनों प्रकार के कारण परब्रह्म परमात्मा ही है । आत्मकृतेः ।१।४।२६॥ “सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय" इति सिसृक्षुत्वेन प्रकृतस्य ब्रह्मणः तदात्मानं स्वयमकुरुत" इति सृष्टेः कर्मत्वं कर्तृत्वं च प्रतीयत इत्यात्मन एव बहुत्वकरणात्तस्यैव निमित्तत्वमुपादानत्वं च प्रतीयते । अविभक्तनामरूप आत्मा कर्त्ता, स एव विभक्त नामरूपः कार्य्यमिति, कर्तृत्वकर्मत्वयोर्नविरोधः । स्वयमेवात्मानं तथाऽकुरुतेति निमित्तमुपादानं च ।

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