श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२७ ) “उसने कामना की कि अनेक होकर प्रकटूं” इस श्रुति में सृष्टि के इच्छुक ब्रह्म को “उसने स्वयं को ही बहुत किया” इत्यादि में कार्यरूप से वर्णन किया गया है, इन दोनों वाक्यों से ब्रह्म का कर्मत्व और कर्तृत्व प्रतीत होता है इस स्वयं को ही बहुत कर देने की बात से, उसका ही निमित्त और उपादान होना निश्चित होता है । वही अविभक्त नाम रूप आत्मा कर्त्ता है और वही विभक्त नामरूप कार्य है । इस प्रकार कर्तृत्व और कर्मत्व में कोई विरोध नहीं है । जो अपने को स्वयं उस रूप में परिणत करता है वही, निमित्त और उपादान है । “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” आनंदोब्रह्म अपहतपाप्माविजरोवि- मृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः “निष्कलं निष्क्रियं शांतं निरवद्यं- निरंजनम् “स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरः” इति स्वभावतो निरस्तसमस्तचेतनाचेतनवर्तिदोषगंधस्य निरतिशयज्ञानानंदैक- तानस्य परस्यब्रह्मणो विचित्रानंतापुरुषार्थास्पदचिदचिन्मिश्र प्रपंचरूपेणात्मनो बहुभवनसंकल्पपूर्वकं बहुत्वकरणं कथमुपपद्यत इत्याशंक्याह- “ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनंत स्वरूप है’ आनंद ब्रह्म है “वह निष्पाप अजर अमर शोक भूख प्यास रहित है” वह निष्क्रिय, निरंजन, निर्दोष और शांत स्वभाव है “वह महान् आत्मा जरामरणरहित है” इत्यादि वक्यों से प्रतिपादित परब्रह्म जब स्वभाव से ही जडचेतनात्मक समस्त दोषों से रहित है तथा सर्वाधिक ज्ञान और आनंद का धाम है, तो उसका स्वेच्छापूर्वक अनंतविचित्रमय जडचेतन मिश्रित, जगदाकार- रूप में परिणत होना कैसे संभव है ? इस शंका का निवारण करते हैं— परिणामात् ।१।४।२७॥ परिणामस्वाभाव्यात्, नात्रोपदिश्यमानस्य परिणामस्य पर- स्मिन् ब्रह्मणि दोषावहत्वं स्वभावः प्रत्युत निरंकुशैश्वर्यावहत्वमेवे- त्यभिप्रायः । एवमेव हि परिणाम उपदिश्यते । अशेषहेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानं स्वेतरसमस्तवस्तविलक्षणं सर्वज्ञं सत्यसंकल्पं अवा-