श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमेवात्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते”, “अन्तवदेवाऽस्य तद् भवति”, “नह्यध्रुवैः प्राप्यते”, “प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः”, “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् नास्त्यकृतः कृतेन। तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय। येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्।” इति। “ब्रह्मविदाप्नोति परम्”, “न पुनर्मृत्यवे तदेकं पश्यति”, “न पश्योमृत्यं पश्यति”, “स स्वराड्भवति”, “तमेव विद्वानमृत इह भवति”, “नान्यः पन्था अयनाय विद्यते”, “पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति” इत्यादीनि। वेदान्त वाक्य ज्ञानरहित कर्मफल की क्षीणता तथा ब्रह्मज्ञान की अक्षय फलता का ऐसा विवेचन करते है—“इस लोक की वस्तुएं जैसे नाशवान् है वैसे ही पारलौकिक वस्तुएं भी नाशवान् हैं”—“सकाम कर्मों का फल नाशवान् ही होता है”—“क्षण भंगुर कर्मों से नित्य फल कभी नहीं मिलता”—“यज्ञादि कर्म संसार से पार करने वाली दृढ नौकाएं नहीं हैं” —“लौकिक कर्मों का भली भांति पर्यवेक्षण करके, कर्मों की अक्षमता समझ कर ब्राह्मण को सांसारिक कर्मों की ओर से निर्वेद होता है, वह ब्रह्म तत्व की जिज्ञासा से हाथ में कुश आदि पूजन सामग्रियों को लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के निकट उपस्थित होता है, गुरु अपने निकट उपस्थित प्रशान्तचित्त संयतेन्द्रिय शिष्य को ब्रह्मविद्या का उपदेश दें जिससे कि वह अक्षर तथा सत्य से अवगत हो जाय”—“ब्रह्मवेत्ता पर- ब्रह्म को प्राप्त करता है”—“पुनः मृत्यु को प्राप्त नहीं करता”—“वह एक ही वस्तु को देखता है, जागतिक कामनाओं को न देखने वाला मृत्यु को नहीं देखता”—“वह स्वतंत्र हो जाता है” “उसको जानने वाला अमृत हो जाता है”—“उसे जानकर मृत्यु का अतिक्रमण करता है,—इसके अतिरिक्त मोक्ष का दूसरा उपाय नहीं है”—“प्रेरक आत्मा को भिन्न मानकर उसका कृपा पात्र होता है और उसी से, अमृतत्वं प्राप्त करता है।” इत्यादि।