श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) ननु च साङ्गवेदाध्ययनादेव कर्मणां स्वर्गादिफलत्वं स्वर्गादीनां च क्षयित्वं ब्रह्मोपासनस्यामृतफलत्वं च ज्ञायत एव । अनन्तरं मुमुक्षुर्ब्रह्मजिज्ञासायामेव प्रवर्तताम्, किमर्था धर्मविचारापेक्षा ? एवं तर्हि शारीरकमीमांसायामपि न प्रवर्तताम् साङ्गाध्ययनादेव कृत्स्नस्य, ज्ञातत्वात् । सत्यम्, आपातप्रतीतिर्विद्यत एव, तथापि न्यायानुगृहीतस्य वाक्यस्यार्थनिश्चायकत्वादापातप्रतीतोऽप्यर्थः संशयविपर्ययौ नाति- वर्तते; अतस्तन्निर्णयाय वेदान्तवाक्यविचारः कर्तव्य इति चेत्; तथैव धर्मविचारोऽपि कर्त्तव्यः, इति पश्यतु भवान् । ( शंका ) वेद वेदांग के अध्ययन से ही कर्मों की स्वर्गादि फलता, स्वर्गादि की क्षीणता एव ब्रह्मोपासना की अमृतफलता ज्ञात हो जाती है तो मोक्ष की इच्छा वालो की ब्रह्म जिज्ञासा में ही प्रवृत्ति होगी, उन्हे धर्म विचार की अपेक्षा ही क्या है ? (उत्तर) यदि ऐसी ही बात है कि वेदाध्ययन से ही सब कुछ ज्ञात हो जाता है तो शारीरक मीमांसा में ही क्यो प्रवृत्ति होगी । (पूर्वपक्ष) उक्त विषयो की सामान्य प्रतीति अध्ययन से हो जाती है ऐसा सत्य है; फिर भी न्यायानुमोदित वाक्य के अर्थनिर्ण- यक होने से अविचारित रूप से प्रतीत होने वाला सामान्य अर्थ संशय और विपर्यय (भ्रम) की निवृत्ति नही कर पाता, इसलिए अर्थ निर्णायक वेदान्त वाक्यों का विचार आवश्यक है । (उत्तर पक्ष) आपके उक्त मत के अनुसार ही धर्म विचार भी आवश्यक हो जाता है । (लघु पूर्वपक्ष) ननु च ब्रह्मजिज्ञासा यदेव नियमेनापेक्षते, तदेव पूर्ववृत्तं वक्तव्यम् । न धर्मविचारापेक्षा ब्रह्मजिज्ञासायाः, अधीत- वेदान्तस्यानधिगतकर्मणोऽपि वेदान्तवाक्यस्यार्थविचारोपपत्तेः । कर्माङ्गाश्रयाणि उद्गीथ-आदि उपासनानि अत्रैव चिन्त्यन्ते, तदनधि- गतकर्मणो न शक्यं कर्त्तुमिति चेत्, अनभिज्ञो भवान् शारीरक- शास्त्रविज्ञानस्य । अस्मिन् शास्त्रे अनाद्यविद्याकृतविविधभेद-