भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १० ) (प्रतिबाद ) ब्रह्मज्ञान में कर्म ज्ञान ही अपेक्षित पूर्व कारण हो सकता है। कर्मसमुच्चित ज्ञान से ही मुक्ति होती है, ऐसा मोक्ष प्रतिपादक श्रुति वाक्य से ज्ञात होता है। ऐसा सूत्रकार भी “यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्” मे प्रति- पादन करते हैं। ज्ञानापेक्षित कर्मकाण्ड का विशेष ज्ञान न होने से कौन सा कर्म ज्ञानसमुच्चित हो सकता है, कौन सा नहीं ? ऐसा निर्णय करना कठिन है। इसलिए समस्त कर्ममीमांसा को ब्रह्ममीमांसा का पूर्ववर्त्ती मानना होगा। नैतद् युक्तम्; सकलविशेषप्रत्यनीकचिन्मात्रब्रह्मविज्ञानादेवा- विद्यानिवृत्तेः, अविद्यानिवृत्तेरेव हि मोक्षः । वर्णाश्रमविशेषसाध्य- साधनेतिकर्तव्यताद्यनन्तविकल्पास्पदं कर्म सकलभेददर्शननिवृत्ति- रूपाज्ञाननिवृत्तेः कथमिव साधनं भवेत् ? श्रुतयश्च कर्मणामनित्य- फलत्वेन मोक्षविरोधित्वं, ज्ञानस्यैव मोक्षसाधनत्वं च दर्शयन्ति— “अन्तवदेवास्य तद् भवति”, “तद् यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते, एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते”, “ब्रह्मविदाप्नोति परम्, ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति”, “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति” इत्याद्याः । (वाद) उक्त कथन संगत नही है, सर्वविध भेदों से रहित शुद्ध चिन्मय ब्रह्मज्ञान से ही अविद्या की निवृत्ति होती है, अविद्या की निवृत्ति ही मोक्ष है। वर्ण और आश्रमगत भेद, साध्य, साधन और इतिकर्तव्यता आदि अनन्त भेद सापेक्ष कर्म समस्त भेद दर्शन निवृत्तिरूप अज्ञान निवृत्ति के साधन कैसे हो सकते हैं ? ‘ अज्ञानी का कर्म निश्चित ही नाशवान् होता है”, “इस लोक में कर्मलब्ध वस्तुएं जैसे अशाश्वत होती हैं; वैसे पुण्यचित् स्वर्गादि भी नश्वर है”, “ब्रह्मवेत्ता ही पर ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है”, “ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही होता है।” इत्यादि श्रुतियाँ भी अनित्य फल वाले कर्मों को मोक्ष विरोधी तथा ज्ञान को ही मोक्ष साधक बतलाती हैं। यदपि चेदमुक्तम्—यज्ञादिकमपिक्षाविद्येति, तद् वस्तुविरोधात् श्रुत्यक्षरपर्यालोचनया चान्तःकरणनैर्मल्यद्वारेण विविदिषोत्पत्ता- वुपयुज्यते, न फलोत्पत्तौ, “विविदिषन्तीति” श्रवणात्, विविदिषा-