भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ११ ) यां जातायां ज्ञानोत्पत्तौ शमादीनामेव अन्तरङ्गोपायतां श्रुतिरेवाह “शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्” इति । तदेवं जन्मान्तरशतानुष्ठितानभिसंहितफलविशेषकर्म- मृदितकषायस्य विविदिषोत्पत्तौ सत्याम् “सदेव सोम्येदमग्र आसीद् एकमेवाद्वितीयम्”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, “निष्कलं निष्क्रियं शान्तम्”, “अयमात्मा ब्रह्म”, “तत्त्वमसि” इत्यादिवाक्यजन्यज्ञानाद- विद्या निवर्त्तते । यद्यपि “विद्या यज्ञादि कर्म सापेक्ष है” ऐसा कहा गया है । श्रुति के अक्षरों की पर्यालोचना से स्पष्ट होता है कि अन्तःकरण की निर्मलता द्वारा ब्रह्म जिज्ञासा की उत्पत्ति में ही यज्ञादि कर्म की उपयोगिता है, फलोत्पत्ति में नहीं । यदि इसे फलोत्पत्ति में उपयोगी मानेंगे तो वह ज्ञान वस्तु का विरोधी सिद्ध होगा । “विविदिषन्ति” इस श्रुतिवाक्य से [L14