भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १५ ) वाक्यार्थ ज्ञान के होने पर भी अनादि वासना के कारण थोड़ी बहुत भेद दृष्टि बनी ही रहती है, ऐसा तो आप कह नहीं सकते, क्योंकि आपके मत से भेदवासना मिथ्या है अतः भेदोत्पादक साधनों के रहते हुए भी ज्ञानोत्पत्ति से ही उस मिथ्यावासना की निवृत्ति हो जानी चाहिये। यदि ज्ञानोत्पत्ति होने पर भी मिथ्यारूप उस वासना की निवृत्ति नहीं होती.तो, उसकी निवृत्ति का ज्ञान के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय तो है नहीं, फिर वासना की निवृत्ति कभी भी सम्भव नहीं है। भेद दृष्टि की मूल कारण वासना नष्ट हो जाय और उसका कार्य भेदज्ञान फिर भी बना रहे, ऐसा तो मूर्ख ही कह सकता है। “चन्द्र दो हैं” ऐसा जो ज्ञान होता है उसमें भ्रम के निवारक यथार्थ ज्ञान के होते हुए भी, भ्रम के यथार्थ कारण तिमिर आदि दोष (नेत्र रोग विशेष) की स्थिति रहती है, जिसे यथार्थ स्वानुभूत ज्ञान से दूर नहीं किया जा सकता, इस स्थिति में दो चन्द्र संबंधी मिथ्या भ्रान्ति होती भी है तो कोई विरुद्ध बात नहीं है; किसी प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा दो चन्द्र देखने वाले व्यक्ति की भ्रान्ति निवारण की जाती है तो उसके भ्रम जन्य भय आदि की निवृत्ति हो जाती है। उसी प्रकार वाक्यार्थ जन्य ज्ञान से भेदवासना की निवृत्ति हो जाने पर भेददृष्टि की भी निवृत्ति हो जानी चाहिये, यदि भेददृष्टि बनी रहती है तो निश्चित- ही भेदवासना भी है, वह वाक्यार्थ जन्य ज्ञान से कदापि निवृत्त नहीं होती ऐसा मानना पड़ेगा। भेदवासना के निराकरण से ही ज्ञानोत्पत्ति को चाहने वालों की भी ज्ञानोत्पत्ति कभी हो नहीं सकती, क्योंकि भेदवासना अनन्त काल- संचित होने से अपरिमित है तथा उसके विपरीत भावना (ज्ञानवासना) बहुत ही अल्प है, उसके द्वारा प्रबल भेदवासना का निराकरण सम्भव नहीं है। अतो वाक्यार्थज्ञानादन्यदेव ध्यानोपासनादिशब्दवाच्यं ज्ञानं वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितम् । तथा च श्रुतयः—"विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत", “अनुविद्य विजानाति”, “ओमित्येवात्मानं ध्यायथ”, “निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते”, “आत्मानमेव लोकमुपासीत”, “आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः” “सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः”—इत्येवमाद्याः। ankurnagpal108@gmail.com