भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( १६ ) इससे यह निश्चित होता है कि वाक्यार्थ ज्ञान से भिन्न ध्यान, उपासना आदि शब्दगम्य ज्ञान ही वेदांत वाक्यों का अभीप्सिन तात्पर्य है, ऐसा ही "अच्छी तरह जानकर प्रज्ञा (ध्यान) करनी चाहिये", "भली भांति (वेदांतवाक्यों की) पर्यालोचना करके जानने की चेष्टा करो", "आत्मा का प्रणव रूप से चिन्तन करो", "उपासक उस परमात्मा को देखकर मृत्यु मुख से मुक्त होते है", "आत्मा की ही उपामना करो" "आत्मा ही श्रोतव्य, द्रष्टव्य, मंतव्य और निदिध्यासितव्य है", "वही अन्वेष्टव्य और जिज्ञास्य है"—इत्यादि श्रुतिवाक्यों का भी तात्पर्य है। अत्र निदिध्यासितव्य इत्यादिनेकार्थ्यात् "अनुविद्य विजानाति", "विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" इत्येवमादिभिर्वाक्यार्थज्ञानस्य ध्यानोपकारक- त्वात् "अनुविद्य" "विज्ञाय" इत्यनूद्य "प्रज्ञां कुर्वीत" "विजानाति" इति ध्यानं विधीयते। "श्रोतव्य" इति चानुवादः, स्वाध्यायस्यार्थ- परत्वेनाधीतवेदः पुरुषः प्रयोजनवदर्थावबोधित्वदर्शनात्तन्निर्णयाय स्वयमेव श्रवणे प्रवर्त्तते इति श्रवणस्य प्राप्तत्वात्। श्रवणप्रतिष्ठार्थ- त्वान्मननस्य "मन्तव्य" इति चानुवादः, तस्माद् ध्यानमेव विधीयते। वक्ष्यति च "आवृत्तिरसकृदुपदेशात्" इति। उपर्युक्त श्रुति वाक्यो में निदिध्यासन आदि सभी उपाय एक ही अर्थ के द्योतक हैं। "अनुविद्य विजानाति", "विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" इत्यादि वाक्यों से वाक्यार्थ ज्ञान की ध्यानोपकारकता ही बतलाई गई है, "प्रज्ञा कुर्वीत", "विजानाति" आदि शब्दों में ध्यान का ही विधान बतलामा गया है। "श्रोतव्य" शब्द भी ध्यान का अनुवाद है, अधीत अक्षर राशि का अर्थावबोध ही स्वाध्याय का सही तात्पर्य है, वेदों को पढ़ा हुआ व्यक्ति शब्द के प्रयोजनीय अर्थ को जानकर उमके निर्णय के लिए स्वयं ही श्रवण के लिए प्रस्तुत होता है। इस प्रकार श्रवण भी ध्यान का ही एक प्रकार सिद्ध होता है। श्रवण को स्थिर करना ही मनन का प्रयोजन है, "मनन" 'श्रवण'अपेक्षित उपाय है, इसलिए "मन्तव्य" को भी भ्यान का ही अनुवाद मानना चाहिये, इससे भी ध्यान का ही विधान किया गया है। "आवृत्ति- रसकृदुपदेशात्" सूत्र में सूत्रकार भी उक्त तथ्य का प्रतिपादन करते हैं। ankurnagpal108@gmail.com