श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१ ) रूप वेदन ही ब्रह्मप्राप्ति का साधन है, उसी की उत्पत्ति के लिए आश्रम विहित समस्त कर्मों का जीवन पर्यन्त अनुष्ठान करना चाहिए। सूत्रकार भी इसी बात का समर्थन “अप्रयाणात्तत्रापि हि दृष्टम्”, “अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्”, “सहकारित्वेन च” इत्यादि सूत्रों में करते हैं। वाक्यकार विवेक आदि से ध्रुवानुस्मृति की निष्पत्ति कहते हैं-“विवेक, विमोक, अभ्यास, क्रिया, कल्याण, अनवसाद और अनुद्धर्ष से ध्रुवानुस्मृति होती है, शास्त्र भी इसका समर्थन करते हैं।” विवेकादीनां स्वरूपंचाह—“जात्याश्रयनिमित्तादुष्टादन्नात् कायशुद्धिर्विवेकः” इति। तत्र निर्वचनम्-“आहारशुद्धौ सत्त्व- शुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः” इति। “विमोकः कामानभिष्वङ्गः” इति। “शान्त उपासीत” इति निर्वचनम्, “आरम्भणः शीलनं पुनः पुनरभ्यासः” इति। निर्वचनं च स्मार्त्तमुदाहृतं भाष्यकारेण-“सदा तद्भावभावितः” इति। “पञ्चमहायज्ञाद्यनुष्ठानं शक्तितः क्रिया” इति। निर्वचनं “क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः”, “तमे तंवेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन” इति च। “सत्यार्जवदयादानाहिंसानभिध्याः कल्यायानि” इति। निर्वचनं “सत्येन लभ्यः”, “तेषामेवैष विरजो ब्रह्मलोकः” इत्यादि। “देश- कालवैगुण्याच्छोकवस्त्वाद्यनुस्मृतेश्च तज्जं दैन्यमभास्वरत्वं मनसोऽव- सादः” इति। “तद्विपर्ययोऽनवसादः”। निर्वचनं “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” इति। “तद्विपर्ययजा तुष्टिरुद्धर्षः” इति। तद्विपर्ययोऽनुद्धर्षः, अतिसंतोषश्च विरोधीत्यर्थः। निर्वचनमपि “शान्तो दान्तः” इति। एवं नियमयुक्तस्याश्रमविहितकर्मानुष्ठानेनैव विद्यानिष्पत्तिरित्युक्तं भवति। विवेक आदि का स्वरूप भी बतलाते हैं- जाति आश्रय निमित्त दोषों से रहित अन्न से शरीर की रक्षा करना विवेक है। इस पर शास्त्र- प्रमाण जैसे-“आहार शुद्धि से अन्तःकरण शुद्ध होता है, अन्तःकरण की शुद्धि से ही ध्रुवा स्मृति होती है।” काम्य विषयों में आसक्ति न होना ankurnagpal108@gmail.com