श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( २१ )
विमोक है। इस पर शास्त्र प्रमाण जैसे—"शान्त चित्त से उपासना करनी चाहिए।" अवलम्बनपूर्वक शुभ विषय के पुनः पुनः अनुशीलन को अभ्यास कहते हैं। शास्त्र प्रमाण में भाष्यकार इसमें स्मृतिवाक्य प्रस्तुत करते हैं—"सदा उस परमात्मभाव में निमग्न रहता है।" यथाशक्ति पंचयज्ञों के अनुष्ठान को क्रिया कहते हैं। शास्त्र प्रमाण जैसे—"ब्राह्मण वेदाध्ययन यज्ञ, दान, तप द्वारा भोगतृणारहित होकर परमात्मा को जानने की इच्छा करते हैं।" सत्य, सरलता, दया, दान, अहिंसा और अनभिध्या (सफल चिन्ता) को कल्याण कहते हैं। शास्त्र प्रमाण—"इस विरज (निर्दोष) ब्रह्मलोक को सत्य से प्राप्त करते हैं।" देश काल आदि की विपरीतता तथा शोक के कारणों की स्मृति से होने वाली मन की दुर्बलता और अप्रसन्नता को अवसाद कहते हैं, इनका न होना अनवसाद है। शास्त्र प्रमाण—"यह आत्मा बलहीन (दुर्बल मन वाले) व्ययित से लभ्य नहीं है।" उक्त अवसाद से होने वाले असंतोष को उद्धर्ष कहते हैं, उसकी विपरीत स्थिति है। "शान्तदान्त" आदि वाक्य इसका उदाहरण है। इन नियमो से युक्त आश्रम विहित कर्मानुष्ठान से ही विद्या की निष्पत्ति हो सकती है; यही वक्तव्य का सारांश है। तथाच श्रुत्यन्तरम् "विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अवि- द्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥" इति । अत्राविद्याशब्दाभिहितं वर्णाश्रमविहितं कर्म । अविद्यया कर्मणा, मृत्युं ज्ञानोत्पत्ति- विरोधि प्राचीनं कर्म, तीर्त्वा अपोह्य, विद्यया ज्ञानेन, अमृतं ब्रह्म, अश्नुते प्राप्नोति इत्यर्थः । मृत्युतरणोपायतया प्रतीता अविद्या विद्ये तराद् विहितं कर्मैव, यथोक्तम्—"इयाज सोऽपि सुबहून् यज्ञान् ज्ञानव्यपाश्रयः । ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय ततुं मृत्युमविद्यया ॥" इति । एक दूसरी श्रुति भी उक्त तथ्य की पुष्टि करती है—"जो प्रसिद्ध विद्या और अविद्या दोनों को जानते हैं, वे अविद्या से मृत्यु का अतिक्रमण करके विद्या से अमृतत्व प्राप्त करते हैं।" यहाँ अविद्या शब्द का अर्थ वर्णाश्रम विहित कर्म है। अर्थात् अविद्या-वर्णाश्रम कर्म द्वारा ज्ञानोत्पत्ति विरोधी प्रारब्ध कर्म से,-छुटकारा पाकर, विद्या—ज्ञान