भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २३ ) ज्ञान से, अमृत - ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मृत्युतरण के उपायरूप से प्रतीत अविद्या का तात्पर्य विद्याभिन्न वर्णाश्रम विहित कर्म ही है। जैसा कि कहा गया—"ज्ञान संपन्न उन्होंने भी ब्रह्मबुद्धि अवलंबनपूर्वक, अविद्या द्वारा ज्ञानविरोधी प्राक्तन कर्मों के निवारणार्थ बहुत से यज्ञों का अनुष्ठान किया।" ज्ञानविरोधि च कर्म पुण्यपापरूपम्। ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति- विरोधित्वेनानिष्टफलतयोभयोरपि पापशब्दाभिधेयत्वम्। अस्य च ज्ञानविरोधित्वं ज्ञानोत्पत्तिहेतुभूतशुद्धसत्त्वविरोधिरजस्तमोविवृद्धि- द्वारेण। पापस्य च ज्ञानोदयविरोधित्वम्—"एष एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषति" इति श्रुत्या अवगम्यते। रजस्तमोर्यथार्थज्ञानावरणत्वं सत्त्वस्य च यथार्थज्ञानहेतुत्वं भगवतैव प्रतिपादितं सत्त्वात्संजायते ज्ञानमित्यादिना। अतश्च ज्ञानोत्पत्तये पापं कर्म निरसनीयम्, तन्निरसनञ्च अनभिसंहित- फलेनानुष्ठितेन धर्मेण। तथा च श्रुतिः—"धर्मेण पापमपनुदति" इति। तदेवं ब्रह्मप्राप्तिसाधनं ज्ञानं सर्वाश्रिमकर्मापेक्षम्, अतो ऽपेक्षितकर्मस्वरूपज्ञानं केवलकर्मणामल्पास्थिरफलत्व ज्ञानं च कर्म- मीमांसावसेयम् इति, सैवापेक्षिता ब्रह्मजिज्ञासायाः पूर्ववृत्ता वक्तव्या। पुण्य-पाप रूप कर्म ही ज्ञान विरोधी हैं। ज्ञानोत्पत्ति के विरोधी होने से दोनों ही अनिष्ट फलदायी हैं, इसलिए दोनों का ही पाप शब्द से कथन किया गया है। चित्तशुद्धि से ज्ञानोत्पत्ति होती है, रज और तम गुणों की वृद्धि करने वाला पाप उसके प्रतिकूल है, इसलिए वह ज्ञान- विरोधी है। पाप की ज्ञानोदय-विरोधिता "जिसको अधोगति देना चाहते हैं उससे भगवान ही पाप कराते हैं।" इस श्रुति से ज्ञात होती है। रज और तम की ज्ञानावरणता तथा सत्त्व की यथार्थ ज्ञानहेतुता का प्रतिपादन स्वयं भगवान् ने ही "सत्त्वात्संजायतेज्ञानम्" इत्यादि से किया है, इसलिए ज्ञानोदय के लिए पाप कर्म का निरसन आवश्यक है, उसका निराकरण अनासक्त फल वाले कर्मानुष्ठान से ही हो सकता है। जैसा कि श्रुति-वाक्य भी है—"धर्म से पापों का निरसन होता है।"