भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( २६ ) “सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् । इतीरित- स्तेन स राजवर्यः तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः ॥”, “विभेदजनके ज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥”, “अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।” “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।” “न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ।” इत्यादिभिर्वस्तुस्वरूपोपदेशपरैः शास्त्रैः निर्विशेषचिन्मात्रं ब्रह्मैव सत्यम् अन्यत् सर्वं मिथ्या इत्यभिधानात् । महापूर्वपक्ष (शांकरमत)—सर्व प्रकार के विशेष धर्मों से रहित चिन्मय ब्रह्म ही यथार्थ सत्य है। उसके अतिरिक्त ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान आदि सभी प्रकार के भेद उस ब्रह्म मे ही कल्पित है, सभी मिथ्या है, जैसा कि “हे सौम्य ! यह सब कुछ पहले एक अद्वितीय सत् ही था,—बाद मे परा से अक्षर की अभिव्यक्ति हुई, जो बुद्धीन्द्रिय, अगम्य, कर्मेन्द्रिय, अगम्य, मूल कारण रहित, स्थूलता शुक्लता आदि अवस्थाओ से रहित, नेत्र-कान-हाथ पर रहित, नित्य, विभु, सूक्ष्म, अव्यय और भूतो के कारण है, उनको धीर लोग सभी ओर देखते है, ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त रूप है—वह अखण्ड निष्क्रिय शांत निर्दोष और निर्मल है, जो सोचते है कि हम ब्रह्म को नही जानते वस्तुत वे ही यथार्थ ज्ञाता है, ब्रह्म विशेषज्ञो से अज्ञात तथा अज्ञो से ज्ञात है—वह दृष्टा की दृष्टि से दृष्ट तथा मनन करने वाले के मन से मननीय नही है — ब्रह्म आनन्द है,—यह सब कुछ आत्म-स्वरूप है, इसमे कोई विभिन्नता नही है,—जो इसमे भेद देखता है वह बार-बार मृत्यु को प्राप्त करता है,—जब द्वैत भाव में रहता है तभी दूसरे को दूसरा समझता है,—जब सब कुछ आत्मभूत है तो कौन किसे देखे, कौन किसे जाने ? —घट आदि केवल कहने मात्र के है, एक मात्र मिट्टी ही यथार्थ है,—जिस समय इसमें भेद देखता है तभी जीव भयभीत होता है, किसी भी उपाधि से परब्रह्म में दोनों बातें (सविशेषता और निर्विशेषता) नही हो सकती, सर्वत्र इसकी निर्विशेष, रूपता ही बतलाई गई है,— स्वप्न दृष्ट वस्तु मायामय है क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति नही होती — भेद रहित, सत्ता मात्र, अगोचर, वाणी और अन्तः करण से संवेद्य ज्ञान ही ब्रह्म नाम वाला है —नितान्त निर्मल ज्ञानस्वरूप वह भ्रमवश विकारों ankurnagpal108@gmail.com