भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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के रूप में परिलक्षित होता है,—हे प्रभु ! एक मात्र आप ही परमार्थ सत्य है, और सब कुछ मिथ्या है, आप ज्ञानमय है, यह दृश्यमान जगत आपकी ही मूर्ति है, योग रहित व्यक्ति ही इस जगत को आपसे भिन्न देखता है, जो शुद्ध चित्त ज्ञाता है वे समस्त जगत को ज्ञानात्मक आपका ही रूप मानते हैं, जो अपने और दूसरे शरीरों में एक मात्र सत् को देखते हैं, उनका ऐसा विज्ञान ही परमार्थ है, द्वैत वादी वस्तुतः तथ्य नहीं जानते । जैसे एक व्यापक वायु वेणुरंध्रों में प्रवेश करके षड्ज आदि नाम प्राप्त करता है, वैसे ही परमात्मा में भी भेद है । यदि मुझसे कुछ भिन्न है तब तो यह मैं हूं; अमुक दूसरा है ऐसा कहा जा सकता है, जो मैं हूं, वही तुम हो, तुम्हीं सब कुछ हो, तब भेदभ्रम छोड़ दो—इस प्रकार कहने पर उस राजा ने परमार्थ दृष्टि से भेद भाव का त्याग कर दिया । भेद के मूल कारण भ्रमात्मक वृत्ति के नष्ट हो जाने पर, आत्मा और ब्रह्म के भेद की बात कौन कर सकता है। मैं ही समस्त भूतों का हृदयस्थ आत्मा हूं । मुझे सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ जानो । मेरे अतिरिक्त स्थावर जंगम कुछ भो नहीं है ।” इत्यादि वस्तु स्वरूप का निरूपण करने वाले शास्त्र वचनों से ‘निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म ही सत्य है और सब कुछ मिथ्या है” ऐसा सिद्ध होता है । मिथ्यात्वं नाम प्रतीयमानत्वपूर्वकयथावस्थितवस्तुज्ञान- निवर्त्यत्वम् । यथा रज्ज्वाद्यधिष्ठानसर्पादेः । दोषवशाद् हि तत्र तत्कल्पनम् । एवं चिन्मात्रवपुषि परे ब्रह्मणि दोषपरिकल्पितमिदं देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरादिभेदं सर्वं जगद् यथावस्थितब्रह्मस्वरूपा- वबोधबाध्यं मिथ्यारूपम्, दोषश्च स्वरूपतिरोधानविविधविचित्र- विक्षेपकरी सदसद-अनिर्वचनीया अनाद्यविद्या एव । “अनृतेन हि प्रत्यूढाः, तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानम् ।”, “नासदासीन्नो सदासीत्तदानी तम आसीत्तमसा गूढमग्रे प्रकेतम् ।”, “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।”, “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ।”, “मम माया दुरत्यया ।”, “अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुद्ध्यते ।” इत्यादिभिर्निर्विशेषचिन्मात्रं ब्रह्मैवानाद्यविद्यया सदसदनिर्वाच्या तिरोहितस्वरूपं स्वगतनानात्वं पश्यति इत्यवगम्यते ।