श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३३ ) (शंका) “जो सर्वज्ञ और सर्वविद् है”—“पर की ज्ञान बल क्रिया आदि अनेक स्वाभाविक शक्तियाँ सुनी जाती हैं”—‘वह सत्यकाम और सत्यसंकल्प है” इत्यादि ब्रह्मस्वरूप प्रतिपादक शास्त्रों को बाध्य कैसे करोगे ? (उत्तर) निर्गुण विधायक वाक्यों के सामर्थ्य से। बात यह है— “ब्रह्म स्थूल महान् और दीर्घ नहीं है”—“ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त स्वरूप है”—“वह निर्गुण निरंजन है”—इत्यादि वाक्य निर्विशेष नित्य चैतन्य ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं; और कुछ वाक्य सगुण के प्रतिपादक हैं। दोनों प्रकार के परस्पर विरुद्ध वाक्यों में उक्त अपच्छेद न्याय से निर्गुण विधायक वाक्यों की ही बलवत्ता सिद्ध होती है, क्योंकि निर्गुण विधायक वाक्य गुण विधायक वाक्यों से पूर्ववर्त्ती होने से बलीय हैं। इसलिए हमारे मत में किसी प्रकार की हानि नहीं होती। ननु च—‘‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’’ इत्यत्र सत्यज्ञानादयो गुणाः प्रतीयन्ते । नेत्युच्यते सामानाधिकरण्येनैकार्थत्वप्रतीतेः । अनेक गुण- विशिष्टाभिधानेऽप्येकार्थत्वमविरुद्धम्, इतिचेत्; अनभिधानज्ञो देवानां प्रियः । एकार्थत्वं नाम सर्वपदानामैक्यम्; विशिष्टपदार्थाभिधाने विशेषणभेदेन पदानामर्थभेदोऽवर्जनीयः; ततश्चैकार्थत्वं न सिध्यति एवं तर्हि सर्वपदानां पर्यायता स्यात् अविशिष्टार्थाभिधायित्वात् । एकार्थाभिधायित्वेऽपि अपर्यायत्वमवहितमनाः शृणु । एकत्वतात्पर्य- निश्चयात् एकस्यैवार्थस्य तत्तत्पदार्थविरोधिप्रत्यनीकत्वपरत्वेन सर्व- पदानामर्थवत्त्वमेकार्थत्वमपर्यायता च। ( शंका ) “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इस वाक्य में सत्य ज्ञान आदि परमात्मा के मुण प्रतीत होते हैं। ( समाधान ) उक्त कथन ठीक नहीं है, इनमें परस्पर विशेषण विशेष्य भाव से एकार्थता प्रतीत होती है। यदि कहो कि अनेक गुण विशिष्ट मानने पर भी तो एकार्थता भंग नहीं होती। तो संभवतः आपको “देवानां प्रियः” वाक्य संबंधी नियम का ज्ञान नहीं है। समस्त पदों के अर्थक्य की ही एकार्थता होती है; विशिष्ट पदों के अभिधान में तो विशेषण के भेद से पदों के अर्थ का भेद आवश्यक होता है , इसलिए उनमें एकार्थता की सिद्धि नहीं होती। ( शंका ) यदि ankurnagpal108@gmail.com