श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) ऐसी बात है तो सभी पदों की पर्यायता सिद्ध होती है, क्योंकि सभी पदों में सामान्य अर्थ का अभिधान रहता है। (समाधान) पदों के एकार्था- भिधायी होने पर भी उनमें पर्यायता नहीं होती, इस बात को आप ध्यान देकर सुन लें कि पदों का एक ही अर्थ मे निश्चित तात्पर्य होता है जो कि अन्य से नितांत विपरीत होता है, जिससे समस्त पदों की सार्थकता, एकार्थता और अपर्यायता सिद्ध होती है। एतदुक्तं भवति—लक्षणतः प्रतिपत्तव्यं ब्रह्म सकलेतरपदार्थ- विरोधिरूपम् । तद् विरोधिरूपं सर्वमनेन पदत्रयेण फलतो व्युदस्यते । तत्र सत्यपदं विकारास्पदत्वेनासत्याद् वस्तुनो व्यावृत्तं ब्रह्मपरम्, ज्ञानपदं चान्याधीनप्रकाशजडरूपाद् वस्तुनो व्यावृत्तपरम्, अनन्त पदं च देशतः कालतो वस्तुतश्च परिच्छिन्नव्यावृत्तपरम् । न च व्यावृत्तिर्भावरूपोऽभावरूपो वा धर्मः, अपितु सकलेतरविरोधि ब्रह्मैव । यथा शौक्ल्यादेः कार्ष्ण्यादिव्यावृत्तिस्तत्पदार्थस्वरूपमेव, न धर्मान्त- रम् । एवमेकस्यैव वस्तुनः सकलेतरविरोध्याकारतामवगमय- दर्थवत्तरमेकार्थमपर्यायं च पदत्रयम् । कथन यह है कि लक्षण से जानने योग्य ब्रह्म, अन्य समस्त पदार्थों से विलक्षण रूप वाला है। उसका यह विलक्षण रूप सत्य, ज्ञान और अनंत पदों से स्पष्ट हो जाता है, उसे समस्त पदार्थों से अलग कर देता है। “सत्य” पद विकारास्पद असत् वस्तुओं से अलग करने वाला, “ज्ञान” पद अन्य से प्रकाशित जड़ रूप से अलग करने वाला तथा “अनंत” पद देश काल और वस्तु की परिच्छिन्नता से अलग करने वाला है। उक्त व्यावृत्ति कोई भाव रूप या अभाव रूप वस्तु नहीं है अपितु ब्रह्म को सबसे विरोधी बतलाने की सूचक मात्र है। जैसे कि “शुक्लता दुर्बलता “आदि लक्षण उन उन पदार्थों के स्वरूप के सूचक पद हैं, उन पदार्थों के किसी अन्य गुण के ज्ञापक नहीं हैं। इसी प्रकार उक्त तीनों पद एक ही वस्तु (ब्रह्म) को अन्य सभी पदार्थों से विलक्षण आकार वाला प्रतीत कराते हैं, इस प्रकार उनकी सार्थकता, एकार्थता और अपर्यायता तीनों बातें संगत हो जाती हैं। ankurnagpal108@gmail.com