भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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तस्मादेकमेव ब्रह्म स्वयंज्योतिर्निर्धूत निखिलविशेषमित्युक्तं भवति । एवं वाक्यार्थ प्रतिपादने सत्येव "सदेव सौम्येदमग्र आसी- देकमेवाद्वितीयम्" इत्यादिभि रैकार्थ्यम् । "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते—सदेव सौम्येदमग्र आसीत्—आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्" इत्यादिभिर्जगत्कारणतयोपलक्षितस्य ब्रह्मणः स्वरूपमिद- मुच्यते "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" इति । तत्र सर्वशाखाप्रत्ययन्यायेन कारणवाक्येषु सर्वेषु सजातीयविजातीयव्यावृत्तमद्वितीयं ब्रह्मावगतम्, जगत्कारणतयोपलक्षितस्य ब्रह्मणोऽद्वितीयस्य प्रतिपिपादयिषितं स्वरूपं तदविरोधेन वक्तव्यम्, अद्वितीयत्वश्रुतिर्गुणतोऽपि स- द्वितीयतां न सहते । अन्यथा "निरञ्जनं निर्गुणम्" इत्यादिभिश्च विरोधः, अतश्चैतल्लक्षणवाक्यमखण्डैकरसमेव प्रतिपादयति । इसीलिए उस अद्वैत ब्रह्म को स्वयं प्रकाश और प्रकार भेद रहित कहा गया है, (निर्विशेषता बोधक) वाक्य के अर्थ से भी ऐसा ही ज्ञात होता है । "हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व यह सब एक अद्वितीय सत् ही था" इत्यादि से एकार्थता तथा "जिससे ये सारे भूत उत्पन्न होते हैं"—"पहिले सब सत् ही था"—"पहिले सब कुछ आत्मा ही था" इत्यादि से परमात्मा की जगत्कारणरूपता का निरूपण करके, उसके स्वरूप को इस प्रकार वर्णन किया गया कि—"ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनंत स्वरूप है ।" सर्वशाखा प्रत्ययन्याय ( उपनिषद् की एक शाखा में जो नियम निर्धारित किया गया, उसे सभी शाखाओ में सामंजस्य करने ) के अनु- सार कारणता बोधक सभी वाक्यों से सजातीय विजातीय सभी पदार्थों से विलक्षण अद्वैत ब्रह्म की अवगति होती है । जगतकारण रूप से उप- लक्षित अद्वैत ब्रह्म के जिस रूप का प्रतिपादन किया गया है, वह निर्वि- रोध है ऐसा मानना चाहिए, अद्वैतता की प्रतिपादक श्रुति किसी भी प्रकार सगुण रूप को प्रतिपादन करनेवाली श्रुति के आधार पर द्वैत- भाव को सहन नहीं करती, अन्यथा "ब्रह्म निरंजन निर्गुण है" इत्यादि श्रुतिप्रतिपाद्य तत्त्व से वह विरुद्ध सिद्ध हो जायगी, इससे सिद्ध होता है कि