श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) स्वरूप लक्षण बोधक (सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म) वाक्य अखंड, एकरस अद्वैत ब्रह्म का प्रतिपादक है । ननु च—सत्यज्ञानादिपदानां स्वार्थप्रहाणेन स्वार्थविरोधि- व्यावृत्तवस्तुस्वरूपोपस्थापनपरत्वे लक्षणा स्यात् । नैष दोषः, अभिधानवृत्तेरपि तात्पर्यवृत्तेर्बलीयस्त्वात् । सामानाधिकरण्यस्य हि ऐक्य एव तात्पर्यमिति सर्वसम्मतम् । (शंका) सत्य ज्ञान आदि पद यदि अपने शब्दार्थ का परित्याग कर स्वार्थ विरुद्ध किसी विशेष वस्तुस्वरूप का स्थापन करते है तो, उन पदों में लक्षणा करनी होगी । (समाधान) उक्त दोष नहीं होगा, क्योकि अभिधा वृत्ति (शब्द के मुख्यार्थ) से तात्पर्यार्थ वृत्ति (तात्पर्यार्थ) बलवान होती है । सामानाधिकरण्य (अभेद विशेषण विशेष्य मानने) में ऐसा ही तात्पर्य होता है, ऐसा सर्व- सम्मत सिद्धान्त है । ननु च—सर्वपदानां लक्षणा न दृष्टचरी । ततः किम् ? वाक्य- तात्पर्याविरोधे सत्येकस्यापि न दृष्टा, समभिव्याहृतपदसमुदाय- स्यैतत्तात्पर्यमिति निश्चिते सति द्वयोस्त्रयाणां सर्वेषां वा तदविरोधाय एकस्यैव लक्षणा न दोषाय, तथा च शास्त्रस्थैरभ्युपगम्यते । ( कार्य- वाक्यार्थवादिभिर्लौकिकवाक्येषु सर्वेषां पदानां लक्षणा समाश्रीयते, अपूर्वकार्य एव लिंगादेर्मुख्यवृत्तत्वात् लिंगादिभिः क्रियाकार्यं लक्षणया प्रतिपाद्यते । कार्यान्वितस्वार्थाभिधायिनां चेतरेषां पदानामपूर्वकार्या- न्वित एव मुख्यार्थ इति क्रियाकार्यान्वितप्रतिपादनं लाक्षणिकमेव । अतो वाक्यतात्पर्याविरोधाय सर्वपदानां लक्षणापि न दोषः, अत इदमेवार्थजातं प्रतिपादयन्तो वेदान्ताः प्रमाणम् । ) (शंका) सभी पदों की लक्षणा तो कही भी नहीं देखी जाती । (उत्तर) इससे क्या होता है ? वाक्य के विरुद्ध तात्पर्य होने पर तो एक पद की