भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ६३४ ) कहा गया कि—'वह सत्यस्वरूप परमात्मा, सत्य और असत्य रूप हो गए।' इत्यादि विचित्र जडचेतन रूप से विकृत होते हुए भी, ब्रह्म स्वयं सत्य ही है, अर्थात् समस्त दोषों से अनस्पृष्ट, अनिवार्य ज्ञानानंदमय वह सदा एक रूप रहते हैं। सर्वाणि चिदचिद्वस्तूनि, सूक्ष्मदशापन्नानि स्थूलदशा- पन्नानि च परस्य ब्रह्मणो लीलोपकरणानि सृष्ट्यादयश्चलीलेति, भगवद् द्वैपायन पराशरादिभिरुक्तम् “अव्यक्तादिविशेषांतं परिणा- मर्धिसंयुतम् क्रीडाहरेरिदं सर्वं क्षरमित्युपधार्यताम्” क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय बालः क्रीडनकैरेव इत्या- दिभिः। वक्ष्यति च—“लोकवत्तु लीला कैवल्यम्” इति । सारी जडचेतन वस्तुएं, चाहे वह सूक्ष्मदशा में हों अथवा स्थूल दशा में हों, परब्रह्म की लीलोपकरण मात्र है, यह सब सृष्टि आदि परमात्मा की लीला ही है, ऐसा भगवान् द्वैपायन और पराशर आदि का कथन है। “परिणाम युक्त, अव्यक्त से लेकर विशेष (स्थूल विकार) तक सब कुछ, हरि की क्रीडा मात्र है, इसे क्षर ही मानना चाहिए, हरि की इस क्रीडा को, बालकों की क्रीडात्मक चेष्टा ही समझना चाहिए” बालक जैसे खिलोना आदि से खेलता है वैसे ही-इत्यादि। लोकवत्तु लीला कैवल्यम्' इस सूत्र में भगवान बादरायण उक्त बात ही कहते हैं। “अस्मान्मायी सृजेत विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया सन्नि- रुद्धः” इति ब्रह्मणि जगद्रूपतया विक्रियमाणेऽपि तत्प्रकारभूता- चिदंशगताः सर्वे विकाराः तत्प्रकारभूत क्षेत्रगताश्चापुरुषार्था इति विवेक्तुं प्रकृतिपुरुषयोर्ब्रह्मशरीरभूतयोस्तदानीं तथा निर्देशानर्हति सूक्ष्मदशापत्त्या ब्रह्मणैकीभूतयोरपि भेदेनव्यपदेशः “तदात्मानं स्वयमकुरुत” इत्यादिभिरैकार्थ्यात् । तथा च मानवं वचः—“सोऽ- भिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः अप एव ससर्जादौ तासुवीर्यमपासृजत्” इति । अतएव ब्रह्मणो निर्दोषत्वनिर्विकारत्व- श्रुतयश्चोपपन्नाः अतो ब्रह्मैव जगतो निमित्तमुपादानं च । ankurnagpal108@gmail.com

( ६३५ ) "मायाधीश इस प्रकृति से, इस विश्व की सृष्टि करते हैं, और दूसरा (जीव) माया द्वारा इस सृष्टि में बाना जाता है" इत्यादि में यह बतलाया गया है कि-ब्रह्म के जगदाकार रूप में विकृत होने पर उनका जितना भी विकार है वह तो सारा का सारा उनके शरीर स्थानीय अचेतनांश मे प्रतिष्ठित रहता है, तथा जो कुछ अपुरुषार्थ (परिहार्य अनर्थ) है वह परमात्मा के ही शरीर स्थानीय क्षेत्रज्ञ (जीव) में रहता है । इस बात को स्पष्ट करने के लिए ही, ब्रह्म की शरीर भूत अवर्णनीय अतिसूक्ष्म अवस्था वाली वस्तु प्रकृति और पुरुष को ब्रह्मात्मक होते हुए, भी, भिन्न बतलाया गया है । ऐसा मानने से ही “उन्होंने स्वयं अपने को जगद् रूप में परिणत किया" इत्यादि वाक्यों का सामंजस्य हो सकता है । ऐसा ही मनुजी का भी वचन है-“उन्होंने अपने शरीर से विविध प्रजा की सृष्टि की इच्छा से सर्व प्रथम जल की सृष्टि की और उसमें वीर्य का रोपण किया ।” इस प्रकार ब्रह्म की निर्दोषता और निर्विकारता श्रुतियों से सिद्ध होती है । ब्रह्म ही जगत के निमित्त और उपादान कारण हैं । योनिश्च हि गीयते ।१।४।२८। इतश्च जगतोनिमित्तमुपादानं च ब्रह्म, यस्माद् योनित्वेनाप्य- भिधीयते “कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्म योनिम्” इति । “यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः” इति च योनिशब्दश्चोपादानवचन इति । “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च” इति वाक्यशेषादवगम्यते । इसलिए भी, ब्रह्म, जगत के निमित्त और उपादान कारण हैं कि परमात्मा को सब की योनि बतलाया गया है । "जगत कर्त्ता पुरुष, योनि स्वरूप ब्रह्म को” “उस भूत योनि को साधक लोग दर्शन करते हैं' इत्यादि में उन्हें योनि शब्द से निर्देश किया गया है "जैसे कि मकड़ी सृजन और ग्रहण करती है" इत्यादि वाक्यशेष से, उसकी उपादानता भी ज्ञात होती है । ८ सर्वव्याख्यानाधिकरणः- एतेन सर्वे व्याख्याताः व्याख्याताः ।१।४।२९॥ ankurnagpal108@gmail.com

( ६३६ ) एतेन पादचतुष्टयोक्तन्यायकलापेन, सर्ववेदांतेषु जगत् कारण प्रतिपादनपराः सर्वे वाक्य विशेषाः चेतनविलक्षण सर्वज्ञ सर्वशक्ति ब्रह्म प्रतिपादनपरा व्याख्याताः । “व्याख्याताः” इति पदाभ्यासो अध्याय परिसमाप्ति द्योतनार्थः । इस अध्याय के चारों पादो का जिस प्रणाली से विवेचन किया गया है, उससे निश्चित होता है कि—समस्त वेदांतशास्त्र के जगत प्रति- पादक विशेष वाक्यों में, जडचेतन से विलक्षण सर्वज्ञ सर्वशक्ति संपन्न ब्रह्म का प्रतिपादन ही, एकमात्र तात्पर्य है । “व्याख्याताः” पद की द्विरुक्ति अध्याय समाप्ति की सूचिका है । प्रथम अध्याय समाप्त