श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1008, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय 5/158-161 ] दोनोंमें अभेद-दर्शनकारी भक्त ही इस लीलाको समझनेमें समर्थ :- दण्डभङ्ग-लीला एइ-परम गम्भीर। सेइ बुझे, दुँहार पदे याँर भक्ति धीर ॥ 158 ॥ अनुवाद-दण्डभङ्ग-लीला अत्यन्त गम्भीर है। जिसकी महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनोंके चरणकमलोंमें अचला भक्ति है, वही इस लीलाको समझ सकता है॥ 158 ॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको वास्तविक रूपमें धीर होकर जिन्होंने समझा है, वे ही दोनों प्रभुओंके स्वरूप और इस दण्डभङ्ग-लीलाके तात्पर्यको समझ पायेंगे। पूर्व महाजनोंने श्रीकृष्ण-चरणसेवाके लिये दण्ड ग्रहणकर संसारके अभिनिवेशको त्याग किया है। साधकरूपसे महाजनोंके मार्गका अनुगमन करके वैध-संन्यासकी जो आवश्यकता है, उसको महाप्रभुने भी स्वीकार किया। यद्यपि विद्वत-संन्यासमें (परमहंस अवस्थामें) दण्डकी आवश्यकता नहीं रहती, तथापि लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुने दिखलाया कि वर्णाश्रमके अन्तर्गत संन्यास अथवा विषय-त्याग करते हुए भक्तिके अनुकूल अनुष्ठानके लिये साधक जीवनमें यह आवश्यक है। दास श्रीनित्यानन्द प्रभु इस बातको जानते हैं कि संन्यासकी प्रारम्भिक अवस्थामें जो दण्ड वहनका कार्य है, वह वास्तवमें महाप्रभुका उच्च परमहंसका अधिकार होनेके कारण उनके लिये आवश्यक नहीं है। परन्तु दूसरे जड़बुद्धिवाले व्यक्ति महाप्रभुको 'कुटीचक' या 'बहुदक' संन्यासकी अवस्थामें स्थित समझकर कहीं भ्रमित होकर अपराध ना करें, इसलिये परम उच्चतम अवस्थाका आदर्श दिखलानेके लिये महाप्रभुसे दण्ड-त्याग करवाया ॥ 158 ॥ वक्ता और श्रोता, दोनोंके ही भगवान् होनेके कारण श्रीसाक्षी-गोपालका वृत्तान्त-अलौकिक :- ब्रह्मण्यदेव-गोपालेर महिमा एइ धन्य। नित्यानन्द-वक्ता यार, श्रोता-श्रीचैतन्य ॥ 159 ॥ अनुवाद-ब्रह्मण्यदेव श्रीगोपालकी महिमा भी धन्य है, जिसके वक्ता श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रोता महाप्रभु हैं॥ 159 ॥ अनुभाष्य-श्रीसाक्षी-गोपालकी कथामें चार निर्देशोंपर विचार करना चाहिये-1) श्रीगोपालमूर्ति नित्यसत्य विग्रह है; 2) 'स्वयंसत्य विग्रह'-जड़जगत्की लौकिक विधिको लाँघकर सदैव सत्यकी मर्यादा स्थापित करते हैं; 3) ब्राह्मण-जीवनमें सत्यमें स्थित होना विशेष रूपसे आवश्यक है; 4) श्रीकृष्णभक्त स्वतः ही ब्राह्मण हैं और ऐसे ब्राह्मणके वशीभूत स्वयं श्रीकृष्ण हैं, इसलिये श्रीकृष्णाश्रित ब्राह्मण केवल मायाबद्ध जीव नहीं हैं॥ 159 ॥ पाँचवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रद्धावान श्रोताको श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति :- श्रद्धायुक्त हञा इहा शुने येइ जन। अचिरे मिलये तारे गोपाल-चरण ॥ 160 ॥ अनुवाद-जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस साक्षी-गोपालकी लीलाको श्रवण करता है, उसे शीघ्र ही श्रीगोपालके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है॥ 160 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 161 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णनं नाम पञ्चम-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस चैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 161 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें साक्षिगोपाल-चरित्र-वर्णन नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त। । 159