श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1007, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/147-157 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करते हुए उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे कहा, - "मेरा संन्यास दण्ड दो।" श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,- "उस दण्डके तो तीन टुकड़े हो गये हैं। प्रेमके आवेशमें जब आप गिर रहे थे, तब मैंने आपको पकड़ा, किन्तु हम दोनों ही दण्डके ऊपर गिर पड़े। हम दोनोंके भारसे दण्ड टुकड़े-टुकड़े हो गया। अब उस दण्डके टुकड़े कहाँ हैं, मुझे कुछ पता नहीं। मेरे अपराधके कारण ही आपका दण्ड टूट गया, इसलिये अब आप जैसा भी उचित समझे, वैसा दण्ड मुझे दे सकते हैं।" 147-151 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आठारनाला'-पुरीमें प्रवेश करनेके लिये जो पुल है, उसका नाम 'आठारनाला' है; उस पुलके नीचे अठारह मेहराब (दो खम्बोंके ऊपर अर्द्ध-मण्डलाकार भाग) हैं॥ 147 ॥ पाँचवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। महाप्रभुका दुःख और थोड़ा क्रोध :- शुनि' किछु महाप्रभु दुःख प्रकाशिला। ईषत् क्रोध करि' किछु कहिते लागिला ॥ 152 ॥ महाप्रभुकी डाँट और अकेले श्रीजगन्नाथके दर्शनकी इच्छाका प्रकाश :- “नीलाचले आसि' मोर सबे हित कैला। सबे दण्डधन छिल, ताहा ना राखिला ॥ 153 ॥ तुमि-सब आगे याह ईश्वर देखिते। किवा आमि आगे याइ, ना याह सहिते ॥” 154 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुकी बात सुनकर महाप्रभुने थोड़ा दुःख प्रकाशित किया और थोड़ा क्रोध करते हुए कुछ कहने लगे, - "मेरे साथ नीलाचल तक आकर आप सबने मेरा बहुत उपकार किया है। संन्यास-दण्ड मेरा एकमात्र धन था, उसे भी आपने सम्भालकर नहीं रखा। अब आप सब आगे चलकर श्रीजगन्नाथका दर्शन करो अथवा मैं आगे जाऊँगा, अब मैं आपके साथ नहीं जाऊँगा॥”152-154 ॥ अनुभाष्य-वैध-संन्यासके योग्य एकदण्ड धारण करना महाप्रभुके लिये अनावश्यक है, क्योंकि महाप्रभु किसी विधिके अधीन नहीं हैं, श्रीनित्यानन्द प्रभुने ऐसा जानकर कि उस दण्डको ढोनेसे महाप्रभुको छुट्टी दे दी। महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुपर क्रोध इसलिये दिखलाया कि उनके द्वारा दण्डत्यागको देखकर भविष्यमें संन्यास लेनेवाले अयोग्य संन्यासी योग्यता प्राप्त करनेसे पहले ही अपने दण्डको तोड़ देंगे और इससे वैदिक-विधि शिथिल हो जायेगी। श्रेष्ठ व्यक्तिके आचरणका जगत्के अन्यान्य लोग अनुसरण करते हैं। भ्रान्त चित्तवाले व्यक्ति श्रुति-स्मृति-पुराणादिमें कहे गये भक्तिके अनुकूल वैधमार्गके तात्पर्यको नहीं समझनेसे उसकी अवहेलना करके मनोकल्पित-मार्गको अनुराग-मार्ग अथवा अवधूताचार मानते हैं। ऐसे लोगोंको भक्तिमें बहुत असुविधा होगी, इसी कारणसे महाप्रभुकी यह क्रोध- प्रदर्शन-लीला है॥ 152 ॥ मुकुन्दका महाप्रभुको पहले जानेका अनुरोध :- मुकुन्द दत्त कहे,-"प्रभु, तुमि याह आगे। आमि-सब पाछे याब, ना याब तोमार सङ्गे ॥” 155 ॥ अनुवाद-श्रीमुकुन्द दत्तने कहा, - "प्रभो! आप आगे चलिये। हम सब आपके पीछे चलेंगे। हम आपके साथ नहीं जायेंगे॥" 155 ॥ दोनों प्रभुओंका भाव-अचिन्त्य :- एत शुनि' प्रभु आगे चलिला शीघ्रगति । बुझिते ना पारे কেহ दुइ प्रभुर मति ॥ 156 ॥ इँहो केने दण्ड भाङ्गे, तँहो केने भाङ्गाय। भाङ्गाञा क्रोधे तँहो इँहाके दोषाय ॥ 157 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु तेज़ीसे आगे चल पड़े। महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु-इन दोनोंके गूढ़ भावोंको कोई नहीं जान सकता। श्रीनित्यानन्द प्रभुने दण्डको क्यों तोड़ा अथवा महाप्रभुने ही उन्हें दण्ड तोड़नेकी अनुमति क्यों दी? और अनुमति देकर फिर क्रोध करके श्रीनित्यानन्द प्रभुको दोष क्यों दे रहे हैं? ॥ 156-157 ॥ 158 ।