श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1006, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय 5/142-151 ] वैष्णवोंका एकमात्र विचार है। 'त्रिदण्डी' न होनेसे कोई भी आत्मसंयम करनेमें समर्थ नहीं होता। कर्मकाण्डीय त्रिदण्डमें इन्द्रदण्ड, वज्रदण्ड और ब्रह्मदण्डके साथ जीवदण्डका समावेश है। श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने त्रिदण्डकी व्याख्यामें काय-मनोवाक्-दण्डकी बात पारमार्थिक त्रिदण्डिगणोंको बतलायी है। त्रिदण्डके साथ जीवदण्डके संयोगमें प्राकृत बुद्धिसे चालित विचारसे त्रिदण्डका पारमहंस-धर्ममें एकदण्ड ही परिलक्षित होता है। किन्तु जिस एकदण्डमें जड़ीय मायाके तीन गुणोंके सम्मिलनमें 'गुणविधौत अवस्था' अर्थात् गुणोंको सम्पूर्ण रूपसे धोनेकी अवस्था नामक एकदण्ड है, वह एकायन पद्धतिमें कलङ्क आरोपित करता है, इसलिये त्रिदण्ड-सम्मिलनमें एकदण्ड ही एकायन पद्धतिमें स्वीकृत हुआ है। ब्रह्मसम्प्रदायमें, ब्रह्म-माध्व-सम्प्रदायमें और ब्रह्म-माध्व-गौड़ीय-सार्वजनिक-वैष्णव-समाजमें वह प्रथा चिरकालसे ही व्यक्त एवं अव्यक्तभावसे विद्यमान है॥ 142-143॥
तीन कोसकी दूरी भी उन्हें हजार योजन जितनी लम्बी लगने लगी॥ 144-146॥ अनुभाष्य—देउल—देवालय। अनङ्गभीम नामक राजाके द्वारा निर्मित वर्तमान श्रीजगन्नाथजीका मन्दिर। उपलभोगका मन्दिर, भोगवर्द्धन खण्ड एवं बाहर बना हुआ ऊँचा चबूतरा उस समयमें नहीं बना था। 'राजमार्ग'—श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये यात्री बङ्गालसे जिस रास्तेसे होते हुए पुरुषोत्तम आते थे। तीन कोस दूरसे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके दर्शन करके श्रीमन्महाप्रभुमें अत्यधिक विरहके कारण सात्त्विक विकार उदित हो गये और वे भगवद्दर्शनके लिये अत्यन्त व्याकुल और उत्कण्ठित हो उठे। बहुत तीव्र विप्रलम्भमें (विरहमें) जिस प्रकार क्षणकालका विरह भी युगके समान प्रतीत होता है, नेत्रोंपर पलकें होनेके कारण गोपियाँ जिस प्रकार विधिकी (सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माकी) मूर्खता बताती हैं, उसी प्रकार तीन कोसका रास्ता महाप्रभुको सुदूर सैकड़ों योजनका लगने लगा॥ 144-146॥
पुरीके मन्दिरको देखकर श्रीकृष्णविरहमें आतुर महाप्रभुका नृत्य और आवेश :— जगन्नाथेर देउल देखि' आविष्ट हैला। दण्डवत् हञा प्रेमे नाचिते लागिला ॥ 144 ॥ भक्तगण आविष्ट हञा, सबे नाचे गाय। प्रेमावेशे प्रभु-सङ्गे राजमार्गे याय ॥ 145 ॥ हासे, कान्दे, नाचे प्रभु हुङ्कार गर्जन। तिनक्रोश पथ हैल—सहस्र-योजन ॥ 146 ॥
अनुवाद—दूरसे ही श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरको देखकर महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये और वहींसे दण्डवत् प्रणाम करके वे प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य करने लगे। भक्तगण भी प्रेमाविष्ट होकर नाचने और गाने लगे और महाप्रभुके साथ राजमार्गपर चलने लगे। कभी हँसते, कभी रोते, कभी नृत्य करते और कभी हुँकार-गर्जन करते हुए महाप्रभु प्रेमावेशमें चल रहे थे। मन्दिरकी
आठारनालामें आकर महाप्रभुकी बाह्य दशा :— चलिते चलिते प्रभु आइला 'आठारनाला'। ताँहा आसि' प्रभु किछु बाह्य प्रकाशिला ॥ 147 ॥
श्रीनिताइसे अपने संन्यास-दण्डकी याचना :— नित्यानन्दे कहे प्रभु,—"देह मोर दण्ड।" नित्यानन्द बले,—"दण्ड हैल तिनखण्ड ॥ 148 ॥
निताइकी चतुरता ओर दण्डभङ्ग-वार्त्ता-निवेदन :— प्रेमावेशे पड़िला तुमि, तोमारे धरिनु। तोमा-सह तेरछे दण्ड-उपरे पड़िनु ॥ 149 ॥ दुइजनार भरे दण्ड खण्ड खण्ड हैल। सेइ दण्ड काँहा पड़िल, किछु ना जानिल ॥ 150 ॥ मोर अपराधे तोमार दण्ड हइल खण्ड। ये उचित हय, मोर कर तार दण्ड ॥" 151 ॥
अनुवाद—चलते-चलते महाप्रभु 'आठारनाला' नामक स्थानपर पहुँचे और वहाँ कुछ बाहरी-ज्ञान प्रकाशित
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