श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1005, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/141-143 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा विचार करके श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डको तोड़कर फेंक दिया ॥ 141-143 ॥ अनुभाष्य- 'कपोतेश्वर' - शिवलिङ्ग। 'दण्ड'— श्रीगौरसुन्दरने काटोयामें शाङ्कर-भारती-सम्प्रदायमें एकदण्ड-संन्यास ग्रहण किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस संन्यास दण्डके तीन टुकड़े करके भार्गी (वर्तमान 'दण्डभाङ्गा') नदीमें फेंक दिया। संन्यासाश्रममें 'कुटीचक' और 'बहूदक' - अवस्थामें दण्डकी रक्षा करनेकी आवश्यकता है, किन्तु 'हंस' और 'परमहंस' अवस्थामें दण्डका त्याग करना ही विधि है। श्रीगौरहरि तो चौदह भुवनोंके पति (स्वामी) हैं, इसलिये उन्हें दूसरे संन्यासियोंकी भाँति न्यून-अधिकार प्रदर्शनकी कोई आवश्यकता नहीं है, ऐसा जानकर श्रीनित्यानन्द-स्वरूपने उस दण्डको तोड़कर फेंक दिया ॥ 142-143 ॥ अमृतानुकणा-चैतन्यभागवत अन्त्यखण्ड, दूसरा अध्याय- “दण्ड हाते करि' हासे नित्यानन्द-राय। दण्डेर सहित कथा कहेन लीलाय ॥ 206 ॥ 'अहे दण्ड, आमि याँरे बहिये हृदये। से तोमारे बहिबेक ए'त युक्त नहे ॥'207॥ एत बलि' बलराम परम प्रचण्ड। फेलिलेन दण्ड भाङ्गि' करि तीन खण्ड ॥ ”208 ॥ इनकी टीका 'गौड़ीय भाष्य'में जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने जनाया है, - “श्रीनित्यानन्द प्रभुने दण्डको सम्बोधित करते हुए कहा, - 'चौदह भुवनोंके पति श्रीकृष्णको हम सब सर्वदा हृदयमें धारण करते हैं; हम उनके नित्य सेवक हैं; तुम हमारे उन नित्य प्रभुको अपने वाहकके रूपमें बनाकर अपराध कर रहे हो। इसलिये श्रीकृष्णने भक्तभावको अङ्गीकार करके जिन सब विधि-ग्रहण या निषेध-त्यागके चिह्न (दण्ड) को अपने हाथों और कन्धोंपर वहन किया है, वह वहनकार्य केवल हम सबको ही शोभा देता है। हे दण्ड ! तुम मेरे प्रभुके प्रभु मत बनो, महाप्रभुके द्वारा तुम स्वयंको मत उठवाओ।' 'प्राकृत सहजिया भक्तब्रुव' अर्थात् प्राकृत-जो भगवान्की अप्राकृत लीलाओंको प्राकृत काम-क्रीड़ाकी भाँति समझते हैं; सहजिया-जो भक्त होनेका अभिनय करते हैं; भक्तब्रुव-जो दिखनेमें तो भक्त हैं, परन्तु वास्तवमें भक्त नहीं हैं, वे श्रीकृष्णसे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष-आदिकी इच्छा करके उनके द्वारा सेवा करवाकर अपने इन्द्रिय-भोग करते हैं। (वास्तविक) भक्तोंका इस प्रकार मनका भाव नहीं होता। “केवलाद्वैतवादी तथाकथित परमहंस एकदण्डी संन्यासी त्रिदण्डी संन्यासियोंका सदा ही अनादर करते हैं। श्रीगौरसुन्दरके द्वारा एक-दण्ड ग्रहण करनेकी छलनेवाली लीला प्रदर्शित करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डको तीन भागोंमें खण्डित करके उसको त्रिदण्डके रूपमें परिणत कर दिया और इस दण्डको वहन करनेका भार भगवद्-सेवकोंके ऊपर दे दिया (अर्थात् भगवान् दण्डको वहन नहीं करेंगे)। इसलिये अति प्राचीनकालसे महाभारतमें जो हंस-गीति है, उसमें “वाचो वेगम्” श्लोक त्रिदण्ड-ग्रहणके प्रमाण और योग्यताको सूचित करता है। और त्रिदण्डिगणोंमें जो रूपानुगत्व है, इसे श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने 'उपदेशामृत'में लिपिबद्ध किया है। ब्रह्ममें लीन होनेके इच्छुक सम्प्रदाय आदिमें दीक्षित प्रच्छन्न बौद्ध-मतावलम्बी मायावादियोंने त्रिदण्डके विरुद्ध 'परिमल' नामकी टीकाममें प्रचुर गाली-गलौज की है। भविष्यमें मायावादी मतमें दीक्षित 'न्यायरक्षामणि', शिवार्क-मणिदीपिका'-आदि ग्रन्थोंके भीतरमें जो भक्ति-विरोधी मतवाद लिखेंगे, उनकी अयोग्यता दिखानेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीगौरसुन्दरके एकदण्डको त्रिदण्डमें परिणत कर दिया। (और) 'शुद्धाद्वैत'-मतावलम्बियोंकी (जैसे श्रीमाध्व-सम्प्रदायकी) शिष्य-परम्परामें जो एकदण्ड ग्रहणकी प्रथा प्रचलित थी और प्रचलित है, वह श्रीमाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायमें अनुमोदित नहीं है। इसे ही समझानेके लिये श्रीबलदेवप्रभुने (श्रीनित्यानन्द प्रभुने) संन्यास-वेषधारी श्रीचैतन्यदेवके एकदण्डको त्रिदण्डमें परिणत किया है—यही श्रीमद्भागवत-सम्मत एवं गौड़ीय 156 ।