श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1004, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय 5/140-143 ] चैतन्यभागवतमें भुवनेश्वर-दर्शन आदिका वर्णन है :- भुवनेश्वर-पथे यैछे कैल दरशन। विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 140 ॥ अनुवाद-भुवनेश्वरके मार्गमें महाप्रभुने जिन-जिन स्थानोंका दर्शन किया, उसका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णन किया है॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चैतन्यभागवत अन्त्यलीलाका दूसरा अध्याय देखें। कटकसे राजमार्गसे बाहर होकर बलिहस्ता या बालकाटिचाटिसे भुवनेश्वर दो-तीन कोसकी दूरीपर है ॥ 140 ॥ अनुभाष्य-चैःभाः अन्त्य, दूसरा अध्याय- "तबे प्रभु आइलेन श्रीभुवनेश्वर। गुप्तकाशी-वास यथा करेन शङ्कर ॥ 307 ॥ सर्वतीर्थ-जल यथा बिन्दु-बिन्दु आनि'। 'बिन्दुसरोवर' शिव सृजिला आपनि ॥ 308 ॥ 'शिवप्रिय सरोवर जानि' श्रीचैतन्य। स्नान करि' विशेषे करिला अति धन्य ॥ "309॥ अर्थात् "तब महाप्रभु श्रीभुवनेश्वर पहुँचे। श्रीभुवनेश्वर गुप्त काशी है, जहाँ शङ्कर निवास करते हैं। सभी तीर्थोंसे बिन्दु-बिन्दु भर जल लाकर स्वयं शिवजीने यहाँ 'बिन्दुसरोवर'का निर्माण किया है। इस सरोवरको शिवजीका प्रिय सरोवर जानकर महाप्रभुने इसमें स्नान करके इसे कृतार्थ किया।" स्कन्दपुराणमें शिवजीका एकाम्रकानन (श्रीभुवनेश्वर) को प्राप्त करनेके इतिहासका वर्णन है। 'काशीराज'-नामक एक राजाने पूजा करके शिवजीको सन्तुष्ट किया। जब काशीराज श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेमें प्रवृत्त हुआ, तब शिवजीने उसकी सहायता की। श्रीकृष्णने सुदर्शन चक्रके द्वारा काशीराजका वध करके काशीको जला दिया। काशीको जलते देखकर शिवजीने पाशुपत अस्त्रका प्रयोग किया, परन्तु श्रीसुदर्शनके आगे वह भी विफल हो गया। तब शिवजीने श्रीकृष्णकी महिमाको जानकर अपने द्वारा किये गये अपराधके लिये क्षमा-याचना की। श्रीकृष्णने उन्हें क्षमा करके नीलाचलके निकट एकाम्रकानन स्थान प्रदान किया। एकाम्रकाननको केशरीवंशीय राजाओंने राजधानी बनाकर कुछेक शताब्दी उत्कलदेशपर राज्य किया॥ 140 ॥ महाप्रभुका श्रीनिताइको संन्यास-दण्ड देना और कमलपुरमें भार्गीनदीमें स्नान :- कमलपुरे आसि भार्गीनदी-स्नान कैल। नित्यानन्द-हाते प्रभु दण्ड धरिल ॥ 141 ॥ महाप्रभु द्वारा कपोतेश्वर-दर्शन और पीछेसे श्रीनिताइके द्वारा महाप्रभुके दण्डको तोड़ना :- कपोतेश्वर देखिते गेला भक्तगण-सङ्गे। एथा नित्यानन्दप्रभु कैल दण्ड भङ्गे ॥ 142 ॥ तिन खण्ड करि' दण्ड दिल भासाञा। भक्त-सङ्गे आइला प्रभु महेश देखिञा ॥ 143 ॥ अनुवाद-कमलपुरमें आकर महाप्रभुने भार्गीनदीमें स्नान किया। श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथोंमें अपने संन्यास-दण्डको पकड़ाकर महाप्रभु भक्तोंके साथ कपोतेश्वरका दर्शन करने चले गये। इधर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके दण्डको तोड़कर उसके तीन टुकड़े करके उसे भार्गी नदीमें बहा दिया। तभी श्रीशिवका दर्शन करके महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ लौट आये ॥ 141-143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'भार्गीनदी'-आजकल 'दण्डभाङ्गा'- नदीके नामसे विख्यात है; यह पुरीसे तीन कोस उत्तरमें है। 'कपोतेश्वर'-दण्डभाङ्गा नदीके निकटमें है। 'दण्ड'-संन्यासके समय महाप्रभुने जिस दण्डको प्राप्त किया था, उसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके हाथमें देकर वे कपोतेश्वर गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुने उस दण्डके तीन टुकड़े करके भार्गी नदीके जलमें बहा दिये, तबसे भार्गी नदीका नाम 'दण्डभाङ्गा' हो गया है। काय, वाक् और मनको दण्डित (शासन) करनेके लिये संन्यासी त्रिदण्ड धारण करते हैं। शङ्कराचार्यकी एकदण्ड धारण करनेकी विधि है। श्रीमहाप्रभुको उस प्रकार दण्ड धारण करनेकी । 155