श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1003, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/128-139 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला एत चिन्ति' नमस्करि' गेला स्वभवने। रात्रिशेषे गोपाल ताँरे कहेन स्वप्ने ॥ 128 ॥ “बाल्यकाले माता मोर नासा छिद्र करि'। मुक्ता पराञाछिल बहु यत्न करि' ॥ 129 ॥ सेइ छिद्र अद्यापिह आछये नासाते। सेइ मुक्ता पराह, याहा चाहियाछ दिते ॥” 130 ॥ अनुवाद—मनमें ऐसी इच्छा करके महारानी श्रीगोपालको प्रणाम करके अपने महलमें चली गयी। उस रातके अन्तमें श्रीगोपालने उसे स्वप्नमें आकर कहा,—“बाल्यकालमें मेरी माताने मेरी नाकमें छेद करके बहुत प्रेमसे उसमें मुक्ता पहनाया था। वह छेद आज भी मेरे नाकमें है। जिस मुक्ताको मुझे देना चाहती हो, उसे तुम मेरे नाकमें पहना सकती हो॥” 128-130 ॥ स्वप्ने देखि' सेइ वाणी राजाके कहिल। राजासह मुक्ता लञा मन्दिरे आइल ॥ 131 ॥ पराइल मुक्ता नासाय छिद्र देखिञा। महामहोत्सव कैल आनन्दित हञा ॥ 132 ॥ सेइ हैते गोपालेर कटकेते स्थिति। एइ लागि' 'साक्षिगोपाल' नाम हैल ख्याति ॥ 133 ॥ अनुवाद—तब महारानीने उस स्वप्नकी बात राजाको बतलायी और राजाके साथ मुक्ता लेकर मन्दिरमें आ गयी। श्रीगोपालके नाकमें छेद देखकर उन्हें मुक्ता पहना दिया और परम आनन्दित होकर उन्होंने एक महामहोत्सव किया। तभीसे श्रीगोपालजी कटकमें विराजमान हैं और वे 'साक्षी-गोपाल'के नामसे प्रसिद्ध हैं॥ 131-133 ॥ श्रीनिताइके मुखसे साक्षिगोपालके वृत्तान्तको सुनकर भक्तोंके साथ महाप्रभुको आनन्द :— नित्यानन्द-मुखे शुनि' गोपाल-चरित। तुष्ट हैला महाप्रभु स्वभक्त-सहित ॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुके श्रीमुखसे श्रीसाक्षी- गोपालका लीला-चरित्र सुनकर महाप्रभु और उनके भक्त बहुत प्रसन्न हुए ॥ 134 ॥ भक्तोंका महाप्रभु और श्रीगोपालमें अभेद-दर्शन :— गोपालेर आगे यबे प्रभुर हय स्थिति। भक्तगणे देखे—येन दुँहे एकमूर्त्ति ॥ 135 ॥ दुँहे-एक वर्ण, दुँहे-प्रकाण्ड-शरीर। दुँहे-रक्ताम्बर, दुँहार स्वभाव-गम्भीर ॥ 136 ॥ महा-तेजोमय दुँहे कमल-नयन। दुँहार भावावेश, दुँहे-चन्द्रवदन ॥ 137 ॥ उनके दर्शनोंसे भक्तोंके साथ श्रीनिताइका परिहास करना :— दुँहा देखि' नित्यानन्दप्रभु महारङ्गे। ठाराठारि करि' हासे भक्तगण-सङ्गे ॥ 138 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब श्रीसाक्षी-गोपालके सामने खड़े थे, तब सभी भक्तोंने देखा महाप्रभु और साक्षी-गोपाल दोनों एक ही समान हैं। उन दोनोंका वर्ण एक जैसा था और दोनोंका शरीर विशाल था। दोनोंने ही लाल वस्त्र पहने हुए थे और दोनोंका ही स्वभाव अत्यन्त गम्भीर था। दोनों ही महा-तेजवान थे तथा दोनोंके नेत्र कमलके समान थे। दोनों ही भावमें आविष्ट थे और दोनोंके मुख ही पूर्णचन्द्रके समान उज्ज्वल और सुशीतल थे। दोनोंके दर्शन करके श्रीनित्यानन्द प्रभु बहुत आनन्दित हुए और नेत्रोंसे इशारे करते हुए भक्तोंके साथ स्वयं भी हँसने लगे ॥ 135-138 ॥ प्रातःकाल सभीकी पुरीकी ओर यात्रा :— एइमत महारङ्गे से रात्रि वञ्चिञा। प्रभाते चलिला मङ्गल-आरति देखिञा ॥ 139 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सभीने बड़े आनन्दमें वह रात्रि बितायी। प्रातःकालमें श्रीगोपालकी मङ्गल-आरतीका दर्शन करके सभी पुरीकी ओर चल दिये ॥ 139 ॥ 154 ।