भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1002

पाँचवाँ अध्याय 5/117-127 ] एइ मत विद्यानगरे साक्षिगोपाल। सेवा अङ्गीकार करियाछेन चिरकाल॥ 119॥ अनुवाद - उस देशका राजा भी इस आश्चर्यमय घटनाको सुनकर वहाँ आया और श्रीगोपालके दर्शन करके परम प्रसन्न हुआ। तब राजाने वहाँ एक विशाल मन्दिरका निर्माण करवाया और श्रीगोपालकी सेवाकी सुन्दर व्यवस्था कर दी। तभीसे श्रीगोपाल 'श्रीसाक्षी- गोपाल'के नामसे प्रसिद्ध हो गये। इस प्रकार विद्यानगरमें श्रीसाक्षी-गोपालने बहुत समय तक सेवा ग्रहण की॥ 117-119॥ अनुभाष्य - 'विद्यानगर'- त्रैलिङ्गदेशमें गोदावरी नदी बङ्गालकी खाड़ीमें जहाँ मिलती है, वह स्थान 'कोटदेश'के नामसे प्रसिद्ध है। उड़ीसा राज्यके उस प्रदेशकी प्रादेशिक राजधानी 'विद्यानगर' थी। यह नगर गोदावरी नदीके दक्षिण दिशामें स्थित था। उत्कलके राजा पुरुषोत्तम उस स्थानको अपने अधिकारमें लेकर प्रादेशिक शासनकर्त्ताके द्वारा उसपर शासन करते थे। वर्तमान गोदावरीके उत्तर तटपर स्थित राजमहेन्द्रीसे विद्यानगर 20-25 मील पूर्व-दक्षिणमें स्थित है। राजा प्रतापरुद्रके समयमें श्रीरामानन्द राय वहाँके शासनकर्त्ता थे। 'भिजियानगरम् या भिजियाना-ग्राम या विजयनगर' यह विद्यानगर नहीं है॥ 119॥ उत्कलेर राजा - श्रीपुरुषोत्तम - नाम। सेइ देश जिनि' निल करिया संग्राम ॥ 120 ॥ सेइ राजा जिनि' निल ताँर सिंहासन। 'माणिक्य-सिंहासन' नाम अनेक रतन॥ 121 ॥ अनुवाद-तब एक समय उत्कल देशके राजा श्रीपुरुषोत्तमने विद्यानगरपर चढ़ायी करके युद्धमें उस देशपर विजय प्राप्त कर ली। राजा श्रीपुरुषोत्तमने विद्यानगरको जीतकर वहाँके राजाके सिंहासनको ले लिया। अनेक रत्न जड़े होनेके कारण उस सिंहासनका नाम 'माणिक्य-सिंहासन' था ॥ 120-121 ॥ पुरुषोत्तम-देव सेइ बड़ भक्तराज। गोपाल-चरणे मागे, - 'चल मोर राज ॥ '122 ॥ ताँर भक्तिवशे गोपाल ताँरे आज्ञा दिल। गोपाल लइया सेइ कटके आइल ॥ 123 ॥ जगन्नाथे आनि' दिल माणिक्य-सिंहासन। कटके गोपाल-सेवा करिल स्थापन ॥ 124 ॥ अनुवाद - राजा श्रीपुरुषोत्तमदेव उत्तम कोटिके भक्त थे। उन्होंने श्रीसाक्षी-गोपालके चरणोंमें गिरकर प्रार्थना की, - 'आप कृपा मेरे राज्यमें चलिये।' उनकी भक्तिके वशीभूत होकर श्रीगोपालने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब राजा श्रीगोपालको लेकर कटक आ गये। राजाने उस 'माणिक्य-सिंहासन' को श्रीजगन्नाथदेवजीको भेंट किया और कटकमें श्रीगोपालकी सेवा स्थापित कर दी ॥ 122-124 ॥ अनुभाष्य - 'राज'- राज्यमें ॥ 122 ॥ श्रीगोपाल और रानीकी कथा :- ताँहार महिषी आइला गोपाल-दर्शने। भक्ति करि' बहु अलङ्कार कैल समर्पणे ॥ 125 ॥ ताँहार नासाते बहुमूल्य मुक्ता हय। ताहा दिते इच्छा हैल, मनेते चिन्तय ॥ 126 ॥ 'ठाकुरेर नासाते यदि छिद्र थाकित। तबे एइ दासी मुक्ता नासाय पराइत ॥ '127 ॥ अनुवाद - एक दिन राजा श्रीपुरुषोत्तमदेवकी महारानी श्रीगोपालजीका दर्शन करने आयी और उसने भक्तिपूर्वक श्रीगोपालजीको बहुतसे आभूषण समर्पित किये। महारानीके नाकमें एक बहुत मूल्यवान मुक्ता था और उस मुक्ताको भी श्रीगोपालको देनेकी उनकी इच्छा हुई। तब वह मनमें विचार करने लगी, - 'यदि ठाकुरजीके नाकमें छेद होता, तो यह दासी इस मुक्ताको उनके नाकमें पहनाती ॥ '125-127 ॥ । 153