श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1001, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/103-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गोपालजी यहाँ रह भी जाँय, तो भी किसी प्रकारका भय नहीं है।' 103-105 ॥ एत भावि' सेइ विप्र फिरिया चाहिल। हासिञा गोपालदेव तथाय रहिल ॥ 106 ॥ ब्राह्मणेरे कहे, - "तुमि याह निज-घर। एथाय रहिब आमि, ना याब अतःपर ॥" 107 ॥ अनुवाद-यह विचार करके छोटे ब्राह्मणने जैसे ही घूमकर पीछे देखा, श्रीगोपाल मुस्कुराते हुए वहीं खड़े हो गये। तब गोपालजीने ब्राह्मणको कहा, - "अब तुम अपने घर जाओ, मैं यहीं रहूँगा, इससे आगे नहीं जाऊँगा।" 106-107 ॥ तबे सेइ विप्र याइ' नगरे कहिल। शुनिञा सकल लोक चमत्कार हैल ॥ 108 ॥ आइल सकल लोक साक्षी देखिबारे। गोपाल देखिञा लोक दण्डवत् करे ॥ 109 ॥ गोपाल-सौन्दर्य देखि' लोके आनन्दित। प्रतिमा चलिञा आइला, - शुनिया विस्मित ॥ 110 ॥ अनुवाद-तब उस ब्राह्मणने जाकर गाँवमें सबको गोपालजीके आनेका समाचार दिया। इसे सुनकर सभी लोग बड़े आश्चर्यचकित हो गये और श्रीसाक्षी-गोपालको देखनेके लिये गाँवके बाहर आ गये। श्रीगोपालके दर्शन करके सब उनको दण्डवत् प्रणाम करने लगे और उनके सौन्दर्यको देखकर सबको बहुत आनन्द हुआ। प्रतिमा स्वयं चलकर आयी है, यह सुनकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 108-110 ॥ तबे सेइ बड़विप्र आनन्दित हञा। गोपालेर आगे पड़े दण्डवत् हञा ॥ 111 ॥ सकल लोकेर आगे गोपाल साक्षी दिल। बड़विप्र छोटविप्रे कन्यादान कैल ॥ 112 ॥ अनुवाद-यह समाचार सुनकर वृद्ध ब्राह्मणको बहुत आनन्द हुआ और उन्होंने शीघ्रतासे आकर गोपालजीके आगे गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया। सभी लोगोंके सामने गोपालजीने साक्षी दी, तब बड़े ब्राह्मणने निर्भय होकर छोटे ब्राह्मणको कन्यादान की ॥ 111-112 ॥ तबे सेइ दुइ विप्रे कहिल ईश्वर। “तुमि-दुइ-जन्मे-जन्मे आमार किङ्कर ॥ 113 ॥ दुँहार सत्ये तुष्ट हइलाङ, दुँहे माग' वर।” दुइ विप्र वर मागे आनन्द-अन्तर ॥ 114 ॥ “यदि वर दिबे, तबे रह एइस्थाने। किङ्करेरे दया तब सर्वलोके जाने ॥" 115 ॥ अनुवाद-तब श्रीगोपालने उन दोनों ब्राह्मणोंसे कहा, - “तुम दोनों जन्म-जन्मान्तरसे मेरे सेवक हो। मैं तुम दोनोंकी सत्यतासे बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ, तुम दोनों मुझसे वर माँग लो।" मनमें आनन्दित होते हुए दोनों ब्राह्मणोंने यही वर माँगा, - "यदि आप वर देना चाहते हैं, तो आप इसी स्थानपर रहिये, जिससे आपकी अपने सेवकोंके प्रति दयाको सभी लोग जान सकें॥" 113-115 ॥ गोपाल रहिला, दुँहे करेन सेवन। देखिते आइला सब देशेर लोक-जन ॥ 116 ॥ अनुवाद-तब श्रीगोपाल वहीं रह गये और वे दोनों ब्राह्मण उनकी सेवा करने लगे। इस अद्भुत घटनाके विषयमें सुनकर अनेक देशोंसे लोग श्रीगोपालके दर्शनके लिये वहाँ आने लगे ॥ 116 ॥ श्रीगोपाल और उत्कलके राजा पुरुषोत्तमकी कथा :- से देशेर राजा आइल आश्चर्य शुनिञा। परम सन्तोष पाइल गोपाले देखिञा ॥ 117 ॥ मन्दिर करिया राजा सेवा चालाइल। 'साक्षिगोपाल' बलि' ताँर नाम ख्याति हैल ॥ 118 ॥ 152