भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1000, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1000

पाँचवाँ अध्याय 5/93-105 ]

इसी श्रीगोपालरूपसे वहाँ आयेंगे और श्रीमुखसे साक्षी ब्राह्मण! मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा। परन्तु तुम कभी देंगे, तभी सब लोग विश्वास करेंगे॥"93-94॥ भी मुझे मुड़कर मत देखना। यदि तुम मुझे पीछे कृष्ण कहे, — "प्रतिमा चले, कोथाह ना शुनि।" मुड़कर देखोगे, तो मैं उसी स्थानपर ही रह जाऊँगा। विप्र बले, — "प्रतिमा हञा कह केने वाणी॥95॥ केवल मेरे नूपुरकी ध्वनिको सुनकर समझना कि मैं प्रतिमा नह तुमि, — साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन। तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ। प्रतिदिन एक सेर विप्र लागि' कर तुमि अकार्य-करण॥"96॥ (लगभग एक किलो) चावल पकाकर मुझे भोग लगाना, अनुवाद - श्रीकृष्णने कहा, — "प्रतिमा चलकर जाती उसे खाकर मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलता रहूँगा॥"97-100॥ है, ऐसा तो कहीं नहीं सुना है।" छोटे ब्राह्मणने आर दिन आज्ञा मागि' चलिला ब्राह्मण। कहा, — "तो प्रतिमा होकर आप बोल कैसे रहे हैं? तार पाछे पाछे गोपाल करिला गमन॥101॥ आप जड़मय प्रतिमा नहीं, बल्कि साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन नूपुरेर ध्वनि शुनि' आनन्दित मन। हैं। अपने भक्त ब्राह्मणके धर्मकी रक्षाके लिये आप वह उत्तमान्न पाक करि' कराय भोजन॥102॥ कार्य कर सकते हैं जिसे आपने पहले कभी नहीं अनुवाद - अगले दिन श्रीगोपालकी अनुमति लेकर किया [अर्थात् मेरे साथ चलकर साक्षी दीजिये]॥"95-96॥ ब्राह्मण अपने घरकी ओर चल पड़ा और गोपालजी भी अमृतप्रवाह भाष्य-ब्राह्मणके उपकारके लिये आप उसके पीछे-पीछे चलने लगे। गोपालजीके नूपुरकी न करनेवाले कार्योंको भी करते हो॥96॥ ध्वनिको सुनकर ब्राह्मणके मनमें बहुत आनन्द हो रहा अनुभाष्य-छोटे ब्राह्मणको कोई विष्णुके अर्चाविग्रहमें था और वह प्रतिदिन उत्तम कोटिके चावल पकाकर पत्थर-काष्ठादि बुद्धि रखनेवाला मूर्तिपूजक न समझ ले, गोपालजीको भोग लगाता॥ 101-102॥ इसलिये इस प्रकारके अपयशसे बचानेके लिये ही एइमते चलि' विप्र निज-देशे आइला। उसकी परीक्षाके लिये भगवान्ने ऐसा प्रश्न किया। और ग्रामेर निकट आसि' मनेते चिन्तिला॥103॥ ब्राह्मणने भी सर्वेश्वरके ईश्वर विष्णुकी ईश्वरतामें पूर्ण 'एबे मुञि ग्रामे आइनु, याइमु भवने। विश्वास रखनेवाले भक्तके समान ही उत्तर दिया॥95-96॥ लोकेरे कहिब गिया साक्षीर गमने॥104॥ हासिञा गोपाल कहे, — "शुनह ब्राह्मण। साक्षाते ना देखिले मने प्रतीति ना हय। तोमार पाछे पाछे आमि करिब गमन॥97॥ इँहा यदि रहेन, तबु नाहि किछु भय॥'105॥ उलटिया आमा ना करिह दर्शने। अनुवाद - इस प्रकार चलते-चलते छोटा ब्राह्मण आमाके देखिले, आमि रहिब सेइ स्थाने॥98॥ अपने देशमें आ गया। अपने गाँवके निकट आकर नूपुरेर ध्वनिमात्र आमार शुनिबा। उसने मनमें सोचा,- 'अब मैं अपने गाँवमें आ गया हूँ सेइ शब्दे आमार गमन प्रतीति करिबा॥99॥ और अपने घरमें जाऊँगा। फिर सभी लोगोंको जाकर एकसेर अन्न रान्धि' करिह समर्पण। साक्षीके आनेकी बातको कहूँगा। परन्तु लोग यदि ताहा खाञा तोमार सङ्गे करिब गमन॥" 100॥ गोपालजीको साक्षात् रूपमें नहीं देखेंगे, तो उन्हें अनुवाद - तब श्रीगोपालने हँसते हुए कहा, — "सुनो विश्वास नहीं होगा। और यदि मेरे मुड़कर देखनेपर

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