श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 999, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/83-94 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोग सुनिये ! ये ब्राह्मण सत्यवादी और धर्मपरायण हैं। अपनी प्रतिज्ञाको तोड़नेकी इनकी कभी इच्छा नहीं थी, किन्तु अपने स्वजनोंकी मृत्युके भयसे ही इन्होंने असत्य वचन कहे हैं। मैं इनके पुण्यके प्रभावसे श्रीकृष्णको साक्षी देनेके लिये यहाँ लाऊँगा, तब इन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञाकी सत्यताकी रक्षा करूँगा॥" 83-85 ॥ एत शुनि' नास्तिक लोक उपहास करे। केह बोले, 'ईश्वर-दयालु, आसितेह पारे ॥' 86 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणकी बातको सुनकर कुछ नास्तिक लोग उसका उपहास करने लगे। परन्तु किसीने कहा, - 'ईश्वर बहुत दयालु हैं, वे आ भी सकते हैं ॥' 86 ॥ अनुभाष्य- 'नास्तिक' - क्योंकि श्रीकृष्णकी परमेश्वरता और भक्तवात्सल्यताके ऊपर विश्वास न करके उनकी अर्च्चाविग्रहमें भौम-बुद्धि थी अर्थात् वे उन्हें एक पत्थर-काठ आदिसे बनी जड़वस्तु माननेवाले थे ॥ 86 ॥ तबे सेइ छोटविप्र गेला वृन्दावन। दण्डवत् करि' कहे सब विवरण ॥ 87 ॥ “ब्रह्मण्यदेव ! तुम्मि-बड़ दयामय। दुइ विप्रेर धर्म राख हञा सदय ॥ 88 ॥ कन्या पाब,-मोर मने इहा नाहि सुख। ब्राह्मणेर प्रतिज्ञा याय, - एइ बड़ दुःख ॥ 89 ॥ एत जानि' तुमि साक्षी देह, दयामय। जानि' साक्षी नाहि देय, तार पाप हय ॥” 90 ॥ अनुवाद-तब छोटा ब्राह्मण वृन्दावनकी ओर चल दिया। वहाँ पहुँचकर गोपालजीके सामने दण्डवत् प्रणाम करके वह सब वृत्तान्त सुनाने लगा, - "आप ब्राह्मणोंके रक्षक और परम दयालु हो। कृपा करके हम दोनों ब्राह्मणोंके धर्मकी रक्षा कीजिये। मेरे मनमें ऐसी बात नहीं है कि उनकी कन्या पाकर मैं संसार-सुख भोग करूँगा। उन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञा भङ्ग होगी, यही मेरे लिये बड़े दुःखकी बात है। हे दयामय ! यह जानकर आप चलकर साक्षी दीजिये, क्योंकि जो किसी बातको जानकर भी समय आनेपर जान-बूझकर साक्षी नहीं देता, उसे पाप लगता है [आपको तो कोई पाप स्पर्श नहीं कर सकता, परन्तु यदि आप साक्षी नहीं देंगे, तो उन ब्राह्मणको पाप लगेगा, इसलिये आप अवश्य ही चलिये]॥" 87-90 ॥ अनुभाष्य-मैं बड़े ब्राह्मणकी कन्यासे विवाह करके अपने इन्द्रिय-भोगसुख वर्धनकी लालसासे आपको साक्षी देनेके लिये नहीं कह रहा हूँ, अपितु आपके भक्त उन ब्राह्मणकी प्रतिज्ञा-भङ्ग होनेसे उनको लगनेवाले पापसे उद्धार करके उनके वाक्योंकी रक्षाके लिये ही आपसे साक्षी देनेके लिये कह रहा हूँ ॥ 89 ॥ कृष्ण कहे, - “विप्र, तुमि याह स्वभवने। सभा करि' मोरे तुमि करिह स्मरणे ॥ 91 ॥ आविर्भाव हञा आमि ताँहा साक्षी दिब। तबे दुइ विप्रेर सत्य-प्रतिज्ञा राखिब ॥” 92 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणकी बातको सुनकर श्रीकृष्णने कहा,- 'हे ब्राह्मण ! तुम अपने घर लौट जाओ। वहाँ सबको बुलाकर एक सभा करना और तुम मेरा स्मरण करना। मैं वहाँ सबके सामने आविर्भूत होऊँगा तथा साक्षी देकर तुम दोनों ब्राह्मणोंकी प्रतिज्ञाकी रक्षा करूँगा॥" 91-92 ॥ विप्र बले, - “यदि हओ चतुर्भुज-मूर्त्ति। तबु तोमार वाक्य कारु ना हबे प्रतीति ॥ 93 ॥ एइ मूर्त्ति गिया, यदि एइ श्रीवदने। साक्षी देह यदि, तबे सर्व लोक सुने ॥” 94 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा, - "यदि आप चतुर्भुज रूपमें प्रकट होकर साक्षी देंगे, तो भी आपके वाक्योंपर किसीको विश्वास न होगा। परन्तु यदि आप अपने 150 ।