श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 998, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय 5/64-85 ]
अपनी कन्याका दान करूँगा, मनमें कोई दुविधा मत रखो। मैं अपनी कन्याका दान करूँगा, ऐसा करनेसे मुझे कौन रोक सकता है?' ॥ 64-71 ॥
तबे आमि कहिलाङ दृढ़ करि' मन। 'गोपालेर आगे कह ए-सत्य-वचन ॥' 72 ॥
तबे इँहो गोपालेर आसिया कहिल। 'तुमि जान, एइ विप्रे कन्या आमि दिल ॥' 73 ॥
तबे आमि गोपालेरे साक्षी करिञा। कहिलाङ ताँर पदे प्रणत हइञा ॥ 74 ॥
'यदि एइ विप्र मोरे ना दिबे कन्यादान। साक्षि बोलाइमु तोमाय, हइओ सावधान ॥' 75 ॥
एइ वाक्ये साक्षी मोर आछे महाजन। याँर वाक्य सत्य करि' माने त्रिभुवन ॥' 76 ॥
अनुवाद-तब मैंने भी निश्चय करके कहा, - 'आप गोपालजीके सामने यह सत्य प्रतिज्ञा करो।' तब गोपालजीके सामने इन्होंने कहा था, - 'हे प्रभो! आप साक्षी हों कि मैंने इस ब्राह्मणको अपनी कन्या दान की है।' तब मैंने भी गोपालजीको साक्षी बनाकर उनके चरणोंमें प्रणत होकर कहा था, - 'यदि ये ब्राह्मण मुझे अपनी कन्यादान नहीं करेंगे, तो मैं आपको साक्षी देनेके लिये बुलाऊँगा, आप इस बातका ध्यान रखना।' मेरे इन वचनोंके साक्षी वे परदेवता श्रीगोपाल हैं, जिनके वचनोंको त्रिभुवन सत्य मानता है ॥' 72-76 ॥
अनुभाष्य- 'महाजन' - देवता ॥ 76 ॥
तबे बड़विप्र कहे, - 'एइ सत्य कथा। गोपाल यदि साक्षी देन, आपने आसिं' एथा ॥ 77 ॥
तबे कन्या दिब आमि, जानिह निश्चय।' ताँर पुत्र कहे, - 'एइ भाल बात हय ॥' 78 ॥
अनुवाद-यह सुनकर बड़े ब्राह्मणने कहा,- “यह बात ठीक है। यदि गोपालजी स्वयं यहाँ आकर साक्षी देंगे, तब मैं अवश्य ही इस ब्राह्मणको अपनी कन्याका दान दूँगा।” बड़े ब्राह्मणके पुत्रने भी इसमें सहमति जताते हुए कहा,- “यही बात ठीक है॥” 77-78 ॥
बड़विप्रेर मने, - 'कृष्ण बड़ दयावान्। अवश्य मोर वाक्य तँहो करिबे प्रमाण ॥' 79 ॥
पुत्रेर मने, - 'प्रतिमा ना आसिबे साक्षी दिते।' एइ बुद्धये दुइजन हइला सम्मते ॥ 80 ॥
अनुवाद-बड़े ब्राह्मणके मनमें विश्वास था, - 'श्रीकृष्ण बड़े दयावान् हैं, वे आकर अवश्य ही साक्षी देकर मेरे वाक्योंकी सत्यताको प्रमाणित करेंगे।' बड़े ब्राह्मणके पुत्रके मनमें विचार था, - 'प्रतिमा कभी भी साक्षी देनेके लिये यहाँ नहीं आयेगी।' इस प्रकार मन-ही-मन विचार करके दोनों ही इस बातपर सहमत हो गये ॥ 79-80 ॥
छोटविप्र बले,- 'पत्र करह लिखन। पुनः येन नाहि चले एसब वचन ॥' 81 ॥
तबे सब लोक मेलि' पत्र त' लिखिल। दुँहार सम्मति लञा मध्यस्थ राखिल ॥ 82 ॥
अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा, - “अपने जो अभी कहा है, उसे लिखकर दें, जिससे आप फिर अपने वचनोंसे मुकर न जाँय ।” तब सभी लोगोंने मिलकर इस आशयका एक पत्र लिखा तथा उन दोनों ब्राह्मणोंके हस्ताक्षर करवाकर उनकी सहमतिसे गाँवके सभी लोग बिचौलिये बन गये ॥ 81-82 ॥
तबे छोटविप्र कहे, - 'शुन, सर्वजन। एइ विप्र - सत्य-वाक्, धर्मपरायण ॥ 83 ॥
स्ववाक्य छाड़िते इँहार नाहि कभु मन। स्वजन-मृत्यु-भये कहे असत्य-वचन ॥ 84 ॥
इँहार पुण्ये कृष्णे आनि' साक्षी बोलाइब। तबे एइ विप्रेर सत्य-प्रतिज्ञा राखिब ॥' 85 ॥
अनुवाद-तब छोटे ब्राह्मणने कहा, - “आप सभी
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