श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 997, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 5/57-71 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सब धन लञा कहे,-'चोरे लइल धन।' 'कन्या दिते चाहियाछे'-उठाइल वचन ॥61॥ तोमरा सकल लोक करह विचारे। मोर पितार कन्या दिते योग्य कि इहारे॥' 62 ॥ अनुवाद-बड़े ब्राह्मणने कहा,-"आप लोग मेरा निवेदन सुनिये। मैंने कब क्या कहा था, मुझे ठीकसे स्मरण नहीं है।" यह सुनकर बड़े ब्राह्मणके पुत्रको वाक्-चातुरी दिखानेका अवसर मिल गया। वह निर्लर्ज होकर सबसे कहने लगा, - "तीर्थयात्रामें मेरे पिताजीके पास बहुत धन था। धनको देखकर इस दुष्टको उसे लेनेकी इच्छा हुई। मेरे पिताजीके साथ उस समय और कोई भी नहीं था, केवल यही अकेला था। इसने धतूरा खिलाकर मेरे पिताजीको पागल कर दिया और उनका सारा धन हड़पकर कहने लगा कि 'चोर सब धन ले गये।' और अब यह ऐसी बात उठा रहा है कि 'मेरे पिताजी इसे कन्यादान करना चाहते थे।' आप सब लोग अब विचार करो कि क्या यह मेरे पिताजीकी कन्या देने योग्य है?" 57-62॥ अनुभाष्य- 'छल'- वक्ता जिस शब्दका जिस अर्थमें प्रयोग करता है, उस शब्दके उस अर्थको ग्रहण न करके उसके विपरीत अर्थकी कल्पना करके प्रतिवादी जो सब मिथ्या दोषारोपण करता है, वही 'छल' है॥ 58 ॥ एत शुनि' लोकेर मने हइल संशय। 'सम्भवे,- धनलोभे छाड़े धर्मभय ॥'63 ॥ अनुवाद-बड़े ब्राह्मणके पुत्रकी बात सुनकर लोगोंके मनमें भी संशय हो गया कि ऐसा सम्भव है, क्योंकि धनके लोभमें लोग धर्मके भयको छोड़ देते हैं॥'63॥ अनुभाष्य-धनके लोभसे लोगोंका धर्म-अधर्मका विवेक लुप्त हो जाता है, इसलिये छोटा ब्राह्मण उस समय धनकी लालसासे बड़े-ब्राह्मणके ऊपर अत्याचार कर भी सकता था,-लोगोंने इस प्रकार सन्देह किया॥ 63 ॥ तबे छोटविप्र कहे, "शुन, महाजन। न्याय जिनिबारे कहे असत्य-वचन ॥ 64 ॥ एइ विप्र मोर सेवाय तुष्ट यबे हैला। 'तोरे आमि कन्या दिब' आपने कहिला ॥ 65 ॥ तबे मुञि निषेधिनु, - 'शुन, द्विजवर। तोमार कन्यार योग्य नहि मुञि वर ॥ 66 ॥ काँहा तुमि पण्डित, धनी, परम-कुलीन। काँहा मुञि दरिद्र, मूर्ख, नीच, कुलहीन ॥'67॥ तबु एइ विप्र मोरे कहे बार बार। 'तोरे कन्या दिब, तुमि करह स्वीकार ॥'68॥ तबे आमि कहिलाङ,-'शुन, महामति। तोमार स्त्री-पुत्र-ज्ञातिर ना हबे सम्मति ॥ 69 ॥ कन्या दिते नारिबे, हबे असत्य-वचन।' पुनरपि कहे विप्र करिया यतन ॥ 70 ॥ 'कन्या तोरे दिब, द्विधा ना करिह चित्ते। आत्मकन्या दिब, केबा पारे निषेधिते ॥ '71 ॥ अनुवाद-तब छोटे ब्राह्मणने कहा, "सुनो, महाजन ! तर्कके द्वारा मुझसे जीतनेके लिये ही यह झूठ बोल रहा है। मेरी सेवासे सन्तुष्ट होकर इन ब्राह्मणने जब स्वयं ही कहा था, - 'मैं तुम्हें अपनी कन्याका दान करूँगा।' तब मैंने मना करते हुए कहा था, - 'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! सुनो, मैं आपकी कन्याके लिये योग्य वर नहीं हूँ। कहाँ तो आप पण्डित, धनवान और परम कुलीन हैं और कहाँ मैं दरिद्र, मूर्ख, नीच और कुलहीन हूँ।' किन्तु तब भी इन ब्राह्मणने मुझसे बार-बार कहा था, - 'मैं तुम्हें ही अपनी कन्या-दान करूँगा, तुम बस स्वीकार करो।' तब मैंने कहा था, - 'सुनिये, मान्यवर ! आपके स्त्री, पुत्र और सगे-सम्बन्धी इस बातसे सहमत नहीं होंगे। आप अपनी कन्या मुझे नहीं दे पायेंगे और आपका वचन असत्य हो जायेगा।' किन्तु फिर भी इन्होंने ज़ोर देकर कहा था, - 'मैं तुम्हें 148 ।