श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 996, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय 5/43-60 ] कुलके सम्मानकी रक्षा करूँगा।" 'न्याय'-तर्क ॥ 43-45 ॥ एत शुनि' विप्रेर चिन्तित हैल मन। एकान्त-भावे चिन्ते विप्र गोपाल-चरण ॥ 46 ॥ 'मोर धर्म रक्षा पाय, ना मरे निज-जन। दुइ रक्षा कर, गोपाल, लइनु शरण ॥ '47 ॥ एइमत विप्र चित्ते चिन्तिते लागिल। आर दिन लघुविप्र ताँर घरे आइल ॥ 48 ॥ अनुवाद-पुत्रकी बातें सुनकर वृद्ध ब्राह्मण मन-ही-मन बहुत चिन्तित हो गये। एकान्त भावसे श्रीगोपालजीके श्रीचरणोंको स्मरण करते हुए ब्राह्मण कहने लगे, - हे गोपाल ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। मेरे धर्मपालनमें विघ्न न आये और मेरे परिवार भी न मरे, आप कृपया इन दोनोंकी रक्षा करो।' इस प्रकार वृद्ध ब्राह्मण चिन्ता करने लगे। तब अगले दिन वह छोटा ब्राह्मण उनके घर आया ॥ 46-48 ॥ आसिञा परम-भक्त्ये नमस्कार करि'। विनय करिञा कहे कर-दुइ जुड़ि' ॥ 49 ॥ “तुमि मोरे कन्या दिते करयाछ अङ्गीकार। एबे किछु नाहि कह, कि तोमार व्यवहार ॥” 50 ॥ एत शुनि' सेइ विप्र रहे मौन धरि'। ताँर पुत्र मारिते आइल हाते ठेङ्गा करि' ॥ 51 ॥ “अरे अधम! मोर भगनी चाह विवाहिते। वामन हञा चन्द्रे येन चाह त' धरिते ॥” 52 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने उनको आदरपूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनय करने लगा, - “आपने मुझे अपनी कन्या देनेका वचन दिया था, परन्तु अब आप उस विषयमें कुछ नहीं कह रहे। यह कैसा आपका व्यवहार है?" छोटे ब्राह्मणकी बात सुनकर वृद्ध ब्राह्मण कुछ नहीं बोले, परन्तु उनका पुत्र उस छोटे ब्राह्मणको मारनेके लिये हाथमें लाठी लेकर आया और कहने लगा, - “अरे अधम ! तू मेरी बहनसे विवाह करना चाहता है? बौना होकर तू चाँदको पकड़ना चाहता है ॥"49-52 ॥ ठेङ्गा देखि' सेइ विप्र पलाञा गेल। आर दिन ग्रामेर लोक एकत्र करिल ॥ 53 ॥ सब लोक बड़विप्रे डाकिया आनिल। तबे सेइ लघुविप्र कहिते लागिल ॥ 54 ॥ “इँहो मोरे कन्या दिते करयाछे अङ्गीकार। एबे ये ना देन, पूछ इँहार व्यवहार ॥” 55 ॥ तबे सेइ विप्रेरे पृछिल सर्वजन। “कन्या केने ना देह, यदि दियाछ वचन ॥” 56 ॥ अनुवाद-लाठी देखकर छोटा ब्राह्मण वहाँसे भाग गया, परन्तु अगले दिन उसने गाँवके सभी लोगोंको इकट्ठा कर लिया और उन्हें सब बात बतलायी। उसकी बात सुनकर गाँवके लोग बड़े ब्राह्मणको बुलाकर ले आये। तब छोटे ब्राह्मणने कहा, - “इन्होंने मुझे अपनी कन्या देनेका वचन दिया था, परन्तु अब मुझे अपनी कन्याका दान नहीं दे रहे हैं, आप इनसे पूछिये कि ये ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?" तब सभी लोगोंने बड़े ब्राह्मणसे पूछा, - “यदि तुमने इसे अपनी कन्या देनेका वचन दिया था, तो तुम इसे कन्यादान क्यों नहीं करते? ॥"53-56 ॥ विप्र कहे, - “शुन, लोक, मोर निवेदन। कबे कि बलियाछि, मोर नाहिक स्मरण ॥” 57 ॥ एत शुनि' ताँर पुत्र वाक्य-छल पाञा। प्रगल्भ हइया कहे सम्मुखे आसिञा ॥ 58 ॥ “तीर्थयात्राय पितार सङ्गे छिल बहु धन। धन देखि' एइ दुष्टेर लैते हैल मन ॥ 59 ॥ आर केह सङ्गे नाहि, एइ सङ्गे एकल। धुतुरा खाओयाञा बापे करिल पागल ॥ 60 ॥ । 147