भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 995, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 995

[ 5/37-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोग हाहाकार करने लगे और कहने लगे, - "ऐसी बात फिर कभी अपने मुखमें मत लाना। नीच जातिमें अपनी कन्याको देनेपर हमारे कुलकी मर्यादा नष्ट हो जायेगी। और इस बातको सुनकर सभी लोग हमारा उपहास करेंगे॥" 37-39॥ विप्र बले, - "तीर्थ-वाक्य केमने करि आन। ये हउक्, से हउक्, आमि दिब कन्यादान॥" 40॥ अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणने कहा, - "तीर्थयात्रामें मैंने जो वचन दिया है, उससे मैं कैसे मुकर सकता हूँ? अब जो होना हो, सो हो, मैं तो उसे ही अपनी कन्या दान करूँगा॥" 40॥ ज्ञाति लोक कहे, - "मोरा तोमाके छाड़िब।" स्त्री-पुत्र कहे, - "विष खाइया मरिब॥" 41॥ अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणके अपने वचनपर दृढ़ रहनेकी बात सुनकर सगे-सम्बन्धी लोग कहने लगे, - "तब हम तुमसे सब सम्बन्ध तोड़ देंगे।" और उनकी स्त्री और पुत्रने कहा, - "हम तो विष खाकर मर जायेंगे॥" 41॥ विप्र बले, - "साक्षी बोलाञा करिबेक न्याय। जिति' कन्या लबे, मोर व्यर्थ धर्म हय॥" 42॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 42॥ अनुभाष्य-वृद्ध ब्राह्मणने कहा, - "मैं अपनी प्रतिज्ञानुसार छोटे ब्राह्मणको यदि कन्या प्रदान नहीं करूँगा, तो वह श्रीगोपाल-विग्रहको साक्षीके रूपमें बुलाकर (न्याय करवा लेगा और) बलपूर्वक मेरी कन्याको जय कर ही लेगा। ऐसा होनेपर तब तो मेरा धर्म निष्फल हो जायेगा॥" 42॥ पुत्र बले, - "प्रतिमा साक्षी, सेह दूर देशे। के तोमार साक्षी दिबे, चिन्ता कर किसे॥ 43॥ 'नाहि कहिं'-ना कहिं' ए मिथ्या-वचन। सबे कहिबे-'मोर किछु नाहिक स्मरण॥' 44॥ तुमि यदि कह, - 'आमि किछुइ ना जानि।' तबे आमि न्याय करि' ब्राह्मणेरे जिनि॥" 45॥ अनुवाद-तब उनके पुत्रने कहा, - "इस बातकी साक्षी तो प्रतिमा है और वह भी बहुत दूर देशमें है। कौन आकर आपके विरुद्ध साक्षी देंगे? आप क्यों चिन्ता कर रहे हैं। 'मैंने ऐसा नहीं कहा'-आपको ऐसा झूठ बोलनेकी आवश्यकता नहीं है। आप केवल इतना ही कहना, - 'मुझे कुछ स्मरण नहीं है।' यदि आप केवल यही कहें, - 'मैं इस विषयमें कुछ नहीं जानता', तब मैं तर्कके द्वारा उस ब्राह्मणको जीत लूँगा॥" 43-45॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'मैं कन्या दूँगा, मैंने ऐसा बोला ही नहीं'-ऐसे झूठे वचन मत कहना, केवल इतना ही कहना,-'मुझे यह स्मरण नहीं है॥' 44॥ अनुभाष्य-बड़े ब्राह्मणका पुत्र नास्तिक, स्मार्त्त, सांसारिक विषयोंमें चतुर था, किन्तु उस मूर्खको यह विश्वास नहीं था कि श्रीविग्रह भी चेतन और विभु हैं। कठपुतलीकी भाँति श्रीविग्रहको भी शिला-काष्ठादि समझते हुए उसने अपने पिताजीसे कहा, - "एक तो यह कि साक्षी प्रतिमा है, इसलिये वह चेतन वस्तुकी भाँति बात करेगी-यह बात विश्वास करने योग्य नहीं है। उसपर भी वह तो बहुत दूर है, इसलिये इतनी दूरसे यहाँ आकर साक्षी देना उसके लिये सम्भव नहीं होगा। इसलिये आप किसी प्रकारकी चिन्ता मत कीजिये। आप स्पष्ट रूपसे झूठ बोलकर अपनी प्रतिज्ञाको सम्पूर्ण रूपसे अस्वीकार मत कीजिये। राजा युधिष्ठिरके वाक्य "अश्वत्थामा हत इति गजः" की भाँति, केवल इतना ही कहना और ऐसे ही हाव-भाव दिखाना कि आपको ऐसा कुछ भी स्मरण नहीं आता है, अर्थात् आप इस विषयमें कुछ नहीं जानते। आप यदि ऐसा कहेंगे, तो मैं छोटे ब्राह्मणको कूटतर्कमें जालमें फँसाकर उसको हरा दूँगा और आपको भी कन्यादानरूपी विपत्तिसे सबके सामने छुटकारा दिला दूँगा। इस प्रकार आपकी प्रतिज्ञाको भी टूटनेसे बचाकर 146 ।

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