भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 994

पाँचवाँ अध्याय 5/26-39 ] कहूँ, मुझे रातमें नींद तक नहीं आती। मैं जानता हूँ कि रुक्मीने द्वेषवश मेरा विवाह रोक दिया है।” विदर्भराज भीष्मकके ज्येष्ठपुत्र रुक्मीके द्वारा अपनी बहन रुक्मिणीके हरणके समय श्रीकृष्णको बुरा-भला कहनेपर उसका श्रीकृष्णके साथ युद्ध हुआ। वह उस युद्धमें अवश्य ही मारा जाता, परन्तु अपने भाईकी रक्षाके लिये श्रीकृष्णसे रुक्मिणीके अनुरोधके कारण उसको जीवनदान मिला। श्रीकृष्णने तलवारके द्वारा उसकी मूँछ-दाढ़ीके केशोंको कई जगहसे मूँड़कर तथा उसका मुण्डन करके उसको कुरूप बनाकर छोड़ दिया॥26-28॥ बड़विप्र कहे,—“कन्या मोर निज-धन। निज-धन दिते निषेधिबे कोन् जन॥29॥ तोमाके कन्या दिब, सबाके करि' तिरस्कार। संशय ना कर तुमि, करह स्वीकार॥”30॥ अनुवाद—बड़े ब्राह्मणने कहा,—“कन्या मेरी अपनी सम्पत्ति है, अपनी सम्पत्ति देनेसे मुझे कौन रोक सकता है? मैं सबका तिरस्कार करके भी तुम्हें ही अपनी कन्या दूँगा। मेरी इस बातमें संशय किये बिना तुम मेरे इस प्रस्तावको स्वीकार करो॥”29-30॥ छोटविप्र कहे,—“यदि कन्या दिते आछे मन। गोपालेर आगे कह ए सत्य-वचन॥”31॥ अनुवाद—छोटे ब्राह्मणने कहा,—“यदि मुझे अपनी कन्या देनेका आपने निश्चय कर लिया है, तो आप श्रीगोपालके सामने यह प्रतिज्ञा कीजिये॥”31॥ गोपालेर आगे विप्र कहिते लागिल। “तुमि जान, निज-कन्या इहारे आमि दिल॥”32॥ छोटविप्र बले,—“ठाकुर, तुमि मोर साक्षी। तोमा साक्षी बोलाइमु, यदि अन्यथा देखि॥”33॥ अनुवाद—तब गोपालजीके सामने आकर बड़े ब्राह्मणने कहा,—“हे प्रभो! आप साक्षीके रूपमें जान लीजिये कि मैंने अपनी कन्या इसको दान की है।” तब छोटे ब्राह्मणने गोपालजीकी ओर देखते हुए कहा,—“हे ठाकुरजी! आप मेरे साक्षी हो। मैं आपको साक्षी देनेके लिये बुलाऊँगा यदि ये ब्राह्मण अपनी प्रतिज्ञासे मुकर जायेंगे॥”32-33॥ एत बलि' दुइजने चलिला देशेरे। गुरुबुद्धये छोटविप्र बहु सेवा करे॥34॥ अनुवाद—इतना कहकर दोनों ब्राह्मण अपने देशकी ओर चल दिये। मार्गमें पहलेकी ही भाँति छोटे ब्राह्मणने पूज्य मानकर बड़े ब्राह्मणकी बहुत सेवा की॥34॥ देशे आसि' दुइजने गेला निज-घरे। कतदिने बड़विप्र चिन्तित अन्तरे॥35॥ 'तीर्थे विप्रे वाक्य दिलुँ,—केमते सत्य हय। स्त्री, पुत्र, ज्ञाति, बन्धु जानिबे निश्चय॥'36॥ अनुवाद—विद्यानगर आकर दोनों ब्राह्मण अपने-अपने घर चले गये। कुछ दिन बाद वृद्ध ब्राह्मण हृदयमें चिन्ता करने लगे,—'मैंने तीर्थमें ब्राह्मणको जो वचन दिया था, वह कैसे सत्य हो? अपने स्त्री, पुत्र तथा सङ्गे-सम्बन्धियोंको अवश्य ही इस बातको बताना पड़ेगा॥'35-36॥ एकदिन निज-लोक एकत्र करिल। ता-सबार आगे सब वृत्तान्त कहिल॥37॥ शुनि' सब गोष्ठी तार करे हाहाकार। “ऐछे बात मुखे तुमि ना आनिबे आर॥38॥ नीचे कन्या दिले कुल याइबेक नाश। शुनिञा सकल लोक करिबे उपहास॥”39॥ अनुवाद—वृद्ध ब्राह्मणने एक दिन अपने सगे-सम्बन्धियोंको बुलाया और उनके सामने सारी बात खोलकर रख दी। वृद्ध ब्राह्मणकी बात सुनकर सब । 145