भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 993

[ 5/21-28 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाकुलीन तुमि-विद्या-धनादि-प्रवीण। आमि अकुलीन आर धन-विद्या-हीन ॥ 22 ॥ कन्यादान-पात्र आमि ना हइ तोमार। कृष्णप्रीतये करि तोमार सेवा-व्यवहार ॥ 23 ॥ ब्राह्मण-सेवाय कृष्णेर प्रीति बड़ हय। ताँहार सन्तोषे भक्ति-सम्पद बाड़य ॥"24 ॥ छोटविप्र बले,-"तोमार स्त्री-पुत्र सब। बहु ज्ञाति-गोष्ठी तोमार बहुत बान्धव ॥ 26 ॥ ता'-सबार सम्मति बिना नहे कन्यादान। रुक्मिणीर पिता भीष्मक ताहाते प्रमाण ॥ 27 ॥ भीष्मकेर इच्छा,-कृष्णे कन्या समर्पिते। पुत्रेर विरोधे कन्या नारिल अर्पिते ॥"28 ॥ अनुवाद-बड़े ब्राह्मणकी बात सुनकर छोटे ब्राह्मणने कहा,-"हे ब्राह्मण महाशय! सुनिये, आप ऐसी असम्भव बात क्यों कर रहे हैं जो कभी हो ही नहीं सकती। आप उच्च कुलके ब्राह्मण हैं और विद्या-धनादिसे सम्पन्न भी हैं। मैं छोटे कुलका हूँ, उसपर भी निर्धन और विद्यासे हीन हूँ। मैं आपके कन्यादानका योग्य पात्र नहीं हूँ। श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये ही मैंने आपकी सेवा की है, क्योंकि ब्राह्मणकी सेवा करनेसे श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होते हैं। उनके सन्तुष्ट होनेसे भक्तिरूपी सम्पत्तिकी वृद्धि होती है॥"21-24 ॥ अनुवाद-छोटे ब्राह्मणने कहा,-"आपके परिवारमें स्त्री, पुत्रादि सब लोग हैं और आपके जाति-समाजमें बहुत बन्धु-बान्धव हैं। उन सबकी सम्मतिके बिना कन्यादान नहीं हो सकता। रुक्मिणीके पिता भीष्मक इस बातका प्रमाण हैं। भीष्मककी इच्छा थी कि वे अपनी कन्याको श्रीकृष्णको समर्पित करेंगे, परन्तु अपने पुत्र रुक्मीके विरोधके कारण वे अपनी कन्याको श्रीकृष्णको अर्पण न कर सके॥"26-28 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे छोटे ब्राह्मणने भगवद्भक्त बड़े ब्राह्मणकी सेवा की थी, उसके फलस्वरूप अपने भक्तके सम्मानकी रक्षा करनेके लिये श्रीगोपालठाकुरने साक्षी दी थी। अन्यथा छोटे ब्राह्मणके द्वारा इस प्रकार बड़े ब्राह्मणकी सेवा और उसकी कन्यासे विवाहकी सम्मति आदि क्रियाएँ इन्द्रिय- सुखभोगके लिये सांसारिक कर्मकाण्ड होतीं और श्रीमन्महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु कभी भी उनका आदर नहीं करते ॥ 23-24 ॥ अनुभाष्य-(भाः 10/52/21,25)- "राजासीद्भीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान्। तस्य पञ्चाभवन् पुत्राः कन्यैका रुचिरानना॥ 21 ॥ बन्धूनाममिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप। ततो निवार्य कृष्णद्विट् रुक्मी चैद्यममन्यत"॥ 25 ॥ अर्थात् "महाराज भीष्मक विदर्भदेशके अधिपति थे। उनके पाँच पुत्र और एक कन्या (रुक्मिणी) थी। रुक्मिणीके भाई-बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहनका विवाह श्रीकृष्णसे हो। परन्तु रुक्मी श्रीकृष्णसे बड़ा द्वेष रखता था, उसने उन्हें विवाह करनेसे रोक दिया और चेदिराज शिशुपालको ही अपनी बहिनके योग्य वर समझा।" (भाः 10/53/2)- बड़विप्र कहे,-"तुमि ना कर संशय। तोमाके कन्या दिब आमि, इथे कि विस्मय ॥"25 ॥ श्रीभगवानुवाच- "तथाहमपि तच्चित्तो निद्राञ्च न लभे निशि। वेदाहं रुक्मिणा द्वेषान्ममोद्वाहो निवारितः॥" अनुवाद-यह सुनकर बड़े ब्राह्मणने कहा,-"तुम मेरी बातमें संशय मत करो। मैं तुम्हें अपनी कन्याका दान करूँगा, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?"॥ 25 ॥ अर्थात् "भगवान् श्रीकृष्णने कहा,-"ब्राह्मणदेवता ! जैसे विदर्भराजकुमारी मुझे चाहती है, वैसे मैं भी उन्हें चाहता हूँ। मेरा चित्त उन्हींमें लगा रहता है। कहाँ तक 144 ।