श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 992, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय 5/10-21 ] श्रीसाक्षी-गोपालका वृत्तान्तः दो ब्राह्मणोंकी कथा :- पूर्वे विद्यानगरेर दुइ त' ब्राह्मण। तीर्थ करिबारे दुँहे करिला गमन ॥ 10 ॥ गया, वाराणसी, प्रयाग-सकल करिया। मथुराते आइला दुँहे आनन्दित हञा ॥ 11 ॥ वनयात्राय वन देखि' देखे गोवर्धन। द्वादश-वन देखि' शेषे गेला वृन्दावन ॥ 12 ॥ वृन्दावने गोविन्द-स्थाने महादेवालय। से-मन्दिरे गोपालेर महासेवा हय ॥ 13 ॥ अनुवाद-पूर्वकालमें विद्यानगरमें दो ब्राह्मण थे, वे दोनों तीर्थ यात्रा करनेके लिये चले। वे गया, वाराणसी, प्रयाग आदि सभी तीर्थोंके दर्शन करके बड़े आनन्दित होकर मथुरा पहुँचे। मथुरा आकर व्रजके अनेक वनोंके दर्शन करते हुए वे गोवर्धन आये। इस प्रकार व्रजके प्रमुख बारह वनोंका दर्शन करके अन्तमें वृन्दावन आ पहुँचे। वृन्दावनमें वर्तमान श्रीगोविन्दजीके मन्दिरके स्थानपर उस समय एक विशाल मन्दिर था जिसमें श्रीगोपालकी राज-सेवा होती थी ॥ 10-13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'द्वादशवन' - बारह वन, जैसे- भद्र, बेल, लौह, भाण्डीर और महावन, -ये पाँच वन यमुनाके पूर्वमें; मधु, ताल, कुमुद, बहुला, काम्य, खदीर और वृन्दावन, -ये बाकी सात वन यमुनाके पश्चिममें हैं। इन बारह वनोंको देखकर अन्तमें वे 'पाँच-कोसी वृन्दावन'-नामक स्थान पर गये। तात्पर्य यह है कि बारह वनोंमें जो वृन्दावन है, इस वृन्दावनसे आरम्भ होकर नन्दगाँव, बरसानातक सोलह कोस उसका विस्तार है; उसमें 'पाँच-कोसी वृन्दावन' नामक एक ग्राम है ॥ 12 ॥ केशीतीर्थ, कालीय-ह्रदादिके कैल स्नान। श्रीगोपाल देखि' ताँहा करिला विश्राम ॥ 14 ॥ गोपाल-सौन्दर्य दुँहार मन निल हरि'। सुख पाञा रहे ताँहा दिन दुइ-चारि ॥ 15 ॥ अनुवाद-केशीतीर्थ और कालीय हृद आदिमें स्नान करके दोनों ब्राह्मणोंने श्रीगोपालका दर्शन किया। तत्पश्चात् उन्होंने उसी मन्दिरमें विश्राम किया। श्रीगोपालके सौन्दर्यने उन दोनोंके मनको हर लिया था, इसलिये प्रसन्नतापूर्वक वे दो-चार दिन वहीं रह गये ॥ 14-15 ॥ दुइविप्र-मध्ये एक विप्र-वृद्धप्राय। आर विप्र-युवा, ताँर करेन सहाय ॥ 16 ॥ छोटविप्र करे सदा ताँहार सेवन। ताँहार सेवाय विप्रेर तुष्ट हैल मन ॥ 17 ॥ अनुवाद-दोनों ब्राह्मणोंमेंसे एक ब्राह्मण लगभग वृद्ध हो गये थे और दूसरा ब्राह्मण युवा था तथा वह उनकी सब प्रकारसे सहायता करता था। छोटा ब्राह्मण उनकी सदा सेवा करता था और उसकी सेवासे वृद्ध ब्राह्मण सन्तुष्ट होकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ 16-17 ॥ विप्र बले,-"तुमि मोर बहु सेवा कैला। सहाय हञा आर तीर्थ कराइला ॥ 18 ॥ पुत्रेओ पितार ऐछे ना करे सेवन। तोमार प्रसादे आमि ना पाइलाम श्रम ॥ 19 ॥ कृतघ्नता हय, तोमाय ना कैले सम्मान। अतएव तोमाय आमि दिब कन्यादान ॥" 20 ॥ अनुवाद-वृद्ध ब्राह्मणने छोटे ब्राह्मणसे कहा, - "तुमने मेरी बहुत सेवा की है। मेरे सहायक बनकर तुमने मुझे तीर्थ यात्रा करवायी है। कोई पुत्र भी अपने पिताकी ऐसी सेवा नहीं करता। तुम्हारी कृपासे मुझे यात्रामें कोई भी कष्ट नहीं हुआ। यह मेरी कृतघ्नता होगी यदि मैं तुम्हारा सम्मान नहीं करूँ, इसलिये मैं तुम्हें अपनी कन्याका दान करूँगा ॥" 18-20 ॥ छोटविप्र कहे,-"शुन, विप्र-महाशय। असम्भव कह केने, येइ नाहि हय ॥ 21 ॥ । 143